विधान: ध्रुव तारा समान
प्रस्तावना: एक अनसुलझा रहस्य
क्या आपने कभी सोचा है कि यह अनंत ब्रह्मांड बिखरता क्यों नहीं? क्यों अरबों तारे अपनी जगह पर स्थिर हैं और क्यों समुद्र अपनी सीमाओं को पार नहीं करता? मेरी यह कविता एक ऐसी अदृश्य 'संहिता' की तलाश है, जो तारों की रहस्यमयी चाल से शुरू होकर मानवीय सभ्यता के सबसे बड़े 'सुरक्षा कवच' तक जाती है। यह एक सफ़र है—एक भटके हुए नाविक की बेबसी से लेकर एक सुरक्षित राष्ट्र की ढाल तक का। कविता की आखिरी पंक्तियों में एक ऐसा 'चरम खुलासा' (Grand Reveal) है, जो हमारे अस्तित्व के असली रक्षक और उस 'महानायक' की अमर लेखनी से आपका साक्षात्कार कराएगा। पढ़िए, और उस सत्य को स्वयं खोजिए...
कविता की मुख्य विशेषताएँ :
यह कविता एक रहस्य की तरह शुरू होती है और एक महान सत्य पर खत्म। अंत तक ज़रूर पढ़ें, वह नाम आपका इंतज़ार कर रहा है। — ऐसा ही हो।
सारी सृष्टि विधान से चलती है,
कण-कण संहिता-अधीन है।
नज़र तुम दौड़ा कर देखो,
विधि-विधान नमूना अचूक है।
मौसम समय से बदलता है,
जाड़ा गर्मी हो या बरसात,
दिशा और दशानुसार,
बखूबी नियम में रहता है।
पृथ्वी विधान के पालन में,
अपनी धुरी घूमती है,
सूर्य का चक्र लगाती,
नियम पालन का संदेश देती है।
सूर्य नियमित दिन करता है,
रात काली चादर बिछा जाती है।
रात-दिन का विधान ही कुछ ऐसा,
जीवन को काम और आराम देता है।
अमावस्या-पूर्णिमा की जुगलबंदी है,
जीवन, अमावस्या के बाद पूर्णिमा,
तो पूर्णिमा के बाद अमावस्या तलाशता है।
इस ज़रूरत को चंद्रमा,
नियमतः संतुलित रखता है।
पेड़-पौधों की हरियाली भी,
नियत समय का पालन करती है,
अपनी खूबसूरती की कुर्बानी वह,
पतझड़ में संहितानुसार देने से न कतराती है।
मांसाहारी व शाकाहारी,
नियमतः भोजन करते हैं,
उनकी यह भोजन-संहिता ही,
जीव-वंश संतुलित करती है।
विधि-विधान संहिता की,
सारी सृष्टि कायल है,
नज़र उठा कर तारों को देखो,
सब अपनी जगह टिमटिमाते हैं।
सृष्टि का यह विधान तो,
ईश्वर का वरदान है,
सृष्टि की रचना के साथ ही,
चौ-दिश विधान के पालन का प्रमाण है।
सूर्य से सीखो,
कैसे विधान का पालन वह करता है,
बादल के पर्दे के पीछे वह,
न कामचोरी, न कर्तव्य से कभी डिगता है।
जरा सोचो यदि एक पल को,
सूर्य अपना संविधान त्याग दे,
सोचो जरा चक्रवाती तूफान,
यदि बंद होने का नाम न ले।
विधान केवल मार्ग नहीं,
सुरक्षा कवच की गारंटी है,
यदि सृष्टि विधान न मानती,
तो तेरा-मेरा हाल क्या होता?
सोचो, समुद्र में भटके नाविक को,
दिशाबोध को तरसते उस मन को,
काली रात में ध्रुव तारे की खोज वह करता,
वही ध्रुव तारा तो उसकी संहिता होता।
बाबा साहेब का संविधान है ऐसा,
ध्रुव तारे जैसा टिमटिमाता तारा।
सत्य-अहिंसा का मार्ग दिखाता,
भटके हुओं को मुख्य धारा में लाता।
नियम-कानून, विधि-विधान, संहिता-संविधान न हो तो,
सब कुछ उथल-पुथल हो जाएगा।
सारी सृष्टि संहिता से ही चलती,
इसके बिन जीवन दुखदायी हो जाएगा।
ज्यादा बुद्धि, तेज़ दिमाग मानवजाति,
यहाँ दुर्बुद्धि का अंबार और व्यापार भी है।
संहिता-संविधान यदि न हों तो,
अशांति-अराजकता अथाह है।
यही कारण है तमाम राष्ट्रों ने,
संहिता, संविधान और विधि-विधान बनाए हैं,
देशवासियों ने जिसे अपनाकर,
शांति और सौहार्द लहराए हैं।
पल भर मौन रह कर सोचो,
पल भर संहिता हटा कर देखो,
शांति और सौहार्द की समृद्धि,
पल में क्षत-विक्षत निश्चित है।
इसीलिए तो हम भारतीयों को,
बाबा रचित संविधान ज़रूरी है।
सारी सृष्टि संविधान से लाजवाब चलती,
इंसान भी सृष्टि का हिस्सा है।
इसलिए, मानव जीवन की पूर्णता को,
संविधान जीवन का शानदार और अभिन्न हिस्सा है।
यही संविधान है, शानदार विधान है,
बाबा साहेब ने जिसको बुनकर,
विभिन्नता को एक सूत्र में पिरोकर,
भारतीय गुलदस्ते में सजाया है।
हम मानवजाति,
इसी सृष्टि की रचना है,
कान लगा कर सुन,
जीवन, संहिता के बिना अधूरा है।
सभी को गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ!
(Happy Republic Day!)