काशी के दो गोल
विचार:
मेरी यह कविता गौरव और त्रासदी के दो विपरीत भावों को दर्शाती है। इसका शीर्षक उस विडंबना को उजागर करता है
कि एक ही शहर और एक ही देश ने अपने राष्ट्रीय नायक के साथ दो बिल्कुल अलग-अलग व्यवहार किए हैं।
इस कविता की कुछ महत्वपूर्ण बातें :
संदेश: मेरी यह कविता एक महान खिलाड़ी की विरासत के प्रति एक श्रद्धांजलि होने के साथ-साथ, समाज के लिए एक महत्वपूर्ण और संवेदनशील चेतावनी है। यह उन सवालों को उठाती है, जिन पर समाज को विचार करना ही चाहिए - ऐसा ही हो।
जहां उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की शहनाई की घुन,
काशी में रातों की सुस्ती तोड़ती थी।
वहां जन्मे थे 1960 में एक छोटा उस्ताद,
मोहम्मद शाहिद अपने नौ भाई बहनों में सबसे छोटे थे।।
छोटा था पर छोटा नहीं वह, काशी का वह चहेता उस्ताद था,
जिनका सिर्फ काशी ही नहीं, सारा भारत पूरा आशिक था।
काशी के छोटे शाहिद ने, हाकी स्टीक थामा था,
राष्ट्रीय खेल का मान बढ़ाने, वह काशी से बाहर आया था।।
अपने जादुई खेल सेवा से वह, भारतीय टीम का हिस्सा था,
ड्रिबलिंग का वह जादूगर, ओलंपिक खेलने निकला था।
भी भासकरण के नेतृत्व में, लेफ्ट-राइट आउट का वह शानदार जुगलबंदी था,
1980 के समर ओलंपिक में, मास्को में तिरंगा लहराना जिसका मकसद था।।
ओलंपिक के फाइनल के दिन, भारत पूरा दिल थामें बैठा था,
गोल्ड मेडल का स्वाद चखने देशप्रेमी, रेडियो ट्रांजिस्टर टीवी से चिपका था।
ओलंपिक में तिरंगा सम्मान का, भारतीय टीम पर जोरदार दबाव था,
ड्रिबलिंग के इस जादूगर के गोल ने, देश को गोल्ड मेडल दिलाया था।।
एक कवि की कविता के समान, उसके खेल की लय थी,
प्रेशर में शाहिद ने कविता, हॉकी कलम से, मास्को के मैदानी कागज पर लिख दी थी।
गोल्ड मेडल का स्वाद चखकर, पूरा देश गौरांवित था,
जिधर देखो उधर ही भारतीय टीम के साथ, शाहिद जुबां पे एक शानदार नाम था।।
ओलंपिक में इस जीत से, सारा भारत झूम उठा था,
1964 के बाद ओलंपिक में गोल्ड जीतने का, 16 साल का लंबा इंतजार टूट था।
अपने खेल से देश का शाहिद ने, खूब मान सम्मान बढ़ाया था,
देश ने आगे बढ़ अपने इस लाल को, पदम श्री से नवाजा था।।
अर्जुन और पदम श्री जैसे सम्मानों के साथ वह, 2016 में हमारे बीच से विदा हो चुका था,
अपने काशी-घर को उसने, देश की शान में शानदार बिरासत छोड़ गया था।
शाहिद ने सिर्फ एक कविता ही नहीं, अनेकोनेक कविताएं लिखी थीं,
हॉकी के मैदान में उन्होंने, "हाफ पुश-हाफ हिट" जैसी शानदार बिरासत बिछाई थीं।।
उनकी मृत्यु के 9 साल बाद, आज 29 सितंबर 2025 को देश को ऐसा क्या हुआ,
रास्ता चौड़ीकरण के नाम पर, एक शानदार धरोहर को बुलडोज किया।
उनके परिवार के एक बुजुर्ग, एक दिन की मोहल्ला की खातिर योगी की पुलिस के पैर पड़ते रहे,
उनकी मिन्नतें दरकिनार कर, पुलिस शानदार धरोहर ढहते रहे।।
स्वर्ग से अपने धरोहर ढहता देख, शाहिद बिल्कुल खामोश रहे,
गोल्ड मेडल की धरोहर बनाते वक्त, तालियां बजाने वाले आज बिल्कुल खामोश रहे।
आज ही एशिया कप का विजेता बना, भारत का हर क्रिकेटर यह सोच रहा,
धरोहर जो मैं सजा रहा, उसके टिकने की गारंटी कहां भला।।
स्वर्गीय शाहिद आप चिंता ना करना,
देश प्रेमियों के मन मंदिर में आपकी विरासत जो है छपी।
आह्वान है! देश के तमाम खिलाड़ियों, देश प्रेमियों के मन मंदिर में विरासत बिछाते जानी है,
आपकी विरासत देश प्रेमियों के मन मंदिर में, बुलडोजर की नाकामी है।
क्योंकि,
काशी के दो गोल, एक शानदार और दूसरा बुलडोजर।।