Poems

मेरी रचनाओं का संकलन

काशी के दो गोल

विचार: मेरी यह कविता गौरव और त्रासदी के दो विपरीत भावों को दर्शाती है। इसका शीर्षक उस विडंबना को उजागर करता है कि एक ही शहर और एक ही देश ने अपने राष्ट्रीय नायक के साथ दो बिल्कुल अलग-अलग व्यवहार किए हैं।

इस कविता की कुछ महत्वपूर्ण बातें :

  • भावुकता और स्थानीय जुड़ाव: कविता की शुरुआत बिस्मिल्लाह खान की शहनाई की धुन से करके, काशी की जीवंत सांस्कृतिक और संगीत की विरासत को दर्शाया है। यह मोहम्मद शाहिद के जन्मस्थान से उनके भावनात्मक जुड़ाव को बहुत मजबूती से स्थापित करता है। यह काशी की सांस्कृतिक विरासत को हॉकी के गौरव से जोड़कर एक गहरा अर्थ प्रदान करता है।

  • सटीक विवरण: मैने इस कविता में मोहम्मद शाहिद के परिवार में सबसे छोटे होने, 1980 के मॉस्को ओलंपिक और उनकी ड्रिब्लिंग कला का सटीक उल्लेख किया है। इस तरह के विवरण से यह कविता केवल एक प्रशंसा गीत नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ भी में भी बदल सकता है।

  • शक्तिशाली उपमाएँ: कविता में मैंने शाहिद के खेल की तुलना एक कविता से की है और उनकी हॉकी को कलम कहा है। यह उपमाएँ खेल के प्रति उनके समर्पण को दिखाती हैं। साथ ही, "जादुई खेल सेवा," "ड्रिब्लिंग का जादूगर" और "हाफ पुश-हाफ हिट" जैसे शब्दों का इस्तेमाल उनकी खेल शैली की विशिष्टता को दर्शाता है।

  • विरासत बनाम विकास: कविता का मुख्य मुद्दा विकास के नाम पर विरासत की अनदेखी है, जो यह सवाल उठाता है कि क्या भौतिक प्रगति एक राष्ट्रीय नायक की धरोहर से अधिक मायने रखती है। स्वर्गीय शाहिद का मौन होकर अपनी विरासत को ढहता देखना और उनके परिवार के बुजुर्गों का एक दिन की मोहलत के लिए प्रशासन के सामने गिड़गिड़ाना, इस त्रासदी की गहराई को उजागर करता है।

  • प्रश्न और चिंतन: कविता के अंतिम भाग में क्रिकेटरों के ज़रिए एक चुभता हुआ सवाल उठाया गया है। यह सवाल केवल खेल से जुड़ा नहीं, बल्कि उन सभी लोगों और उनकी विरासत पर है, जो धीरे-धीरे गायब हो रहे हैं या भुला दिए गए हैं। यह कविता हमें अपनी विरासतों के प्रति हमारी ज़िम्मेदारी पर सोचने के लिए मजबूर करती है।


  • संदेश: मेरी यह कविता एक महान खिलाड़ी की विरासत के प्रति एक श्रद्धांजलि होने के साथ-साथ, समाज के लिए एक महत्वपूर्ण और संवेदनशील चेतावनी है। यह उन सवालों को उठाती है, जिन पर समाज को विचार करना ही चाहिए - ऐसा ही हो।


    जॉन अनुरंजन कुजूर
    30/09/2025

    जहां उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की शहनाई की घुन,
    काशी में रातों की सुस्ती तोड़ती थी।
    वहां जन्मे थे 1960 में एक छोटा उस्ताद,
    मोहम्मद शाहिद अपने नौ भाई बहनों में सबसे छोटे थे।।

    छोटा था पर छोटा नहीं वह, काशी का वह चहेता उस्ताद था,
    जिनका सिर्फ काशी ही नहीं, सारा भारत पूरा आशिक था।
    काशी के छोटे शाहिद ने, हाकी स्टीक थामा था,
    राष्ट्रीय खेल का मान बढ़ाने, वह काशी से बाहर आया था।।

    अपने जादुई खेल सेवा से वह, भारतीय टीम का हिस्सा था,
    ड्रिबलिंग का वह जादूगर, ओलंपिक खेलने निकला था।
    भी भासकरण के नेतृत्व में, लेफ्ट-राइट आउट का वह शानदार जुगलबंदी था,
    1980 के समर ओलंपिक में, मास्को में तिरंगा लहराना जिसका मकसद था।।

    ओलंपिक के फाइनल के दिन, भारत पूरा दिल थामें बैठा था,
    गोल्ड मेडल का स्वाद चखने देशप्रेमी, रेडियो ट्रांजिस्टर टीवी से चिपका था।
    ओलंपिक में तिरंगा सम्मान का, भारतीय टीम पर जोरदार दबाव था,
    ड्रिबलिंग के इस जादूगर के गोल ने, देश को गोल्ड मेडल दिलाया था।।

    एक कवि की कविता के समान, उसके खेल की लय थी,
    प्रेशर में शाहिद ने कविता, हॉकी कलम से, मास्को के मैदानी कागज पर लिख दी थी।
    गोल्ड मेडल का स्वाद चखकर, पूरा देश गौरांवित था,
    जिधर देखो उधर ही भारतीय टीम के साथ, शाहिद जुबां पे एक शानदार नाम था।।

    ओलंपिक में इस जीत से, सारा भारत झूम उठा था,
    1964 के बाद ओलंपिक में गोल्ड जीतने का, 16 साल का लंबा इंतजार टूट था।
    अपने खेल से देश का शाहिद ने, खूब मान सम्मान बढ़ाया था,
    देश ने आगे बढ़ अपने इस लाल को, पदम श्री से नवाजा था।।

    अर्जुन और पदम श्री जैसे सम्मानों के साथ वह, 2016 में हमारे बीच से विदा हो चुका था,
    अपने काशी-घर को उसने, देश की शान में शानदार बिरासत छोड़ गया था।
    शाहिद ने सिर्फ एक कविता ही नहीं, अनेकोनेक कविताएं लिखी थीं,
    हॉकी के मैदान में उन्होंने, "हाफ पुश-हाफ हिट" जैसी शानदार बिरासत बिछाई थीं।।

    उनकी मृत्यु के 9 साल बाद, आज 29 सितंबर 2025 को देश को ऐसा क्या हुआ,
    रास्ता चौड़ीकरण के नाम पर, एक शानदार धरोहर को बुलडोज किया।
    उनके परिवार के एक बुजुर्ग, एक दिन की मोहल्ला की खातिर योगी की पुलिस के पैर पड़ते रहे,
    उनकी मिन्नतें दरकिनार कर, पुलिस शानदार धरोहर ढहते रहे।।

    स्वर्ग से अपने धरोहर ढहता देख, शाहिद बिल्कुल खामोश रहे,
    गोल्ड मेडल की धरोहर बनाते वक्त, तालियां बजाने वाले आज बिल्कुल खामोश रहे।
    आज ही एशिया कप का विजेता बना, भारत का हर क्रिकेटर यह सोच रहा,
    धरोहर जो मैं सजा रहा, उसके टिकने की गारंटी कहां भला।।

    स्वर्गीय शाहिद आप चिंता ना करना,
    देश प्रेमियों के मन मंदिर में आपकी विरासत जो है छपी।
    आह्वान है! देश के तमाम खिलाड़ियों, देश प्रेमियों के मन मंदिर में विरासत बिछाते जानी है,
    आपकी विरासत देश प्रेमियों के मन मंदिर में, बुलडोजर की नाकामी है।
    क्योंकि,
    काशी के दो गोल, एक शानदार और दूसरा बुलडोजर।।

    ==> भारत तुझे शांति मिले, संपूर्ण विश्व को शांति, - यही हमारी कामना है।