तथ्यों के परे मत जाओ
प्रस्तावना :
यह रचना सार्वजनिक जीवन में आचरण, सत्यनिष्ठा और वास्तविकता पर ज़ोर देती है। इसका केंद्रीय विषय यह है कि केवल बातों, रौब या झूठी शान से लोगों का दिल नहीं जीता जा सकता, न ही सफलता हासिल की जा सकती है। लोगों की नज़र में सम्मान पाने के लिए ईमानदारी, तथ्य और कर्मठता ज़रूरी है।
कविता की मुख्य ताकतें:
संदेश: यह स्पष्ट करता है कि सफलता केवल हवाई बातों, दावों या शेखी बघारने से नहीं मिलती। वास्तविक और ठोस परिणाम पाने के लिए अपनी बड़ी-बड़ी सोच और योजनाओं को हकीकत में बदलना पड़ता है—यानी कर्म करना पड़ता है, मेहनत करनी पड़ती है। यह किसी भी व्यक्ति के लिए, विशेषकर सार्वजनिक जीवन में, एक महत्वपूर्ण सीख है कि सत्यनिष्ठा, कर्म और व्यावहारिकता ही वास्तविक सम्मान और सफलता की कुंजी है।
छोटी बड़ी बातों में, कभी नाराज ना हुआ करो,
चिंता क्यों करते हो, परेशान ना हुआ करो।
लोग तुम्हें देख रहे हैं, चेहरे का सिकन छिपा लिया करो,
बोलने से पहले, अपने अंदाज भांप लिया करो।
मत समझना रौब से, डरते हैं लोग,
तुम्हारी हर बात पर, चेहरे की सिकन नाप लेंगे लोग।
अपने वक्तव्य को कभी, तथ्यों से परे मत ले जाना,
तथ्य जो जानते हैं, जरूर तथ्य प्रस्तुत कर देंगे लोग।
दफन मत करो, तथ्यों को क्षणिक फायदों में,
गढ़े मुर्दे, निश्चित उखाड़ ही लेंगे लोग।
जब कभी तथ्य, फायदों में विकृत किया जाता है,
पूर्वजों की राह पर चलकर, जान लुटा भी देते हैं लोग।
सत्य की रक्षा, तथ्यों में जीने वाले ही समझते हैं,
असत्य में जीने वाले, तथ्यों से असहज ही महसूस करते हैं।
चेहरों की मुस्कान में छीपी असत्य, पढ़ने के माहिर हैं लोग,
असत्य की कढ़ाई जरूर, तार तार कर देते लोग।
कलियों की शान भी जरूर, जर्जर हो जातीं हैं,
झूठी शान की क्या बात, कलियों से पहले ही मुरझा जातीं हैं।
याद रखना, मुरझाई कलियां फिर भी याद की जाएंगी,
झूठी शान निश्चित, थू-थू की भेंट चढ़ ही जाएंगी।
उपसंहार:
ड़ीग हांकने से किले नहीं बनते, बालू पर कभी घर नहीं बनते,
अपनी सोच आसमान से ज़मीं पे उतारने वाले, तथ्यों से कभी बेवफाई नहीं करते।