सत्य पूर्ण है, और व्यक्तिगत भी
प्रस्तावना :
सत्य के बारे में लोगों के विचार भिन्न हैं—कोई इसे एक 'पूर्ण सत्य' (Absolute Truth) के रूप में देखता है, तो कोई इसे 'व्यक्तिपरक' (Subjective) मानता है।
मेरी यह कविता इन अलग-अलग धारणाओं के बीच एक सेतु बनाने का प्रयास है। यह सत्य के उस स्वरूप का वर्णन करती है जो स्वतंत्रता का रूपक है, और जो शानदार जीवन का एक
मानक होने के साथ-साथ प्रेम और दुलार से भी भरा है। यह कविता एक मार्ग है, एक मानक है और एक जीवनशैली है, जो हमें असत्य के त्याग से लेकर सत्य के साथ आत्मिक निवास तक की यात्रा पर ले जाती है।
कविता के मुख्य बिंदु :
संदेश: आइये, हम सत्य को अपने जीवन में निवास दें, अपने चरित्र का निर्माण कर एक अच्छा नागरिक बनें — ऐसा ही हो।
सत्य महाशक्ति है, अपने आप में पूर्ण है,
सत्य कभी थोपता नहीं, तुम्हारी निष्ठा पर छोड़ता है।
कोई सत्य करे, ना करे, सत्य सब देखता है,
टोका-टोकी नहीं करता है,
असत्य में घिरे का, बेसब्री से इंतज़ार करता है।
सत्य महान है, खूब बलवान है,
सत्य को पुकार कर देखो, सदा तुम्हारे साथ है।
सत्य गतिशील है, बहुत प्रगतिशील है,
असत्य में फँसे व्यक्ति का, निश्चित एहसास है।
सत्य एक राह है, असत्य के विपरीत राह है,
जिस पर चलकर लोग, अनन्त सुख पाते हैं।
सत्य बलिदान है, असत्य का त्याग है,
सत्य में जीना है तो, असत्य कुर्बान है।
सत्य शाश्वत है, और बिल्कुल निजी भी,
दुत्कारने पर भी, उसे सबसे दुलार है।
सत्य पूर्ण है, और व्यक्तिगत भी,
चुनाव हमें करना है, सत्य सदा तैयार है।
सत्य निष्ठावान है, निष्ठा उसकी गरिमा है,
पूर्णता में जीने वाले, सत्य की पहचान हैं।
सत्य स्वतंत्रता का रूपक है, हमें स्वतंत्र रखता है,
असत्य के गुलाम को, सत्य ही स्वतंत्र करता है।
सत्य निवास करता है, निवास की चाहत रखता है,
जो सत्य में निवास करता है, सत्य उसमें निवास करता है।
उपसंहार:
तुम चाहो तो सत्य, या असत्य को निवास दो,
यह तुम पर निर्भर करता है,
लेकिन यह मत भूलना,
सौ दिन का चोर, एक दिन पकड़ा ही जाता है।