पड़ोसियों की गोष्ठी में, एक की नुक्ताचीनी
विचार:
यह कविता केवल एक व्यंग्यात्मक टिप्पणी नहीं है, बल्कि मानवीय संबंधों की जटिलताओं पर एक गहरा चिंतन भी प्रस्तुत करती है।
यह सवाल उठाती है कि क्या शक्ति, अहंकार और स्वार्थ से भरे इस माहौल में वास्तविक पड़ोसी प्रेम संभव है?
यह पाठक को स्वयं इन मुद्दों पर विचार करने के लिए प्रेरित करती है और रिश्तों की कड़वी सच्चाई का सामना करने के लिए मजबूर करती है
इस कविता की कुछ महत्वपूर्ण बातें :
संदेश: किसी भी व्यक्ति, समाज या राष्ट्र की स्थायी और सम्मानजनक छवि का आधार उसके अपने निकटतम रिश्तों में निहित होता है। पास के लोगों के साथ शुद्ध, पवित्र और समझौते वाले संबंध बनाए बिना, दूर के रिश्तों को गढ़ना, दिखावा और अंततः निराशा का कारण बन सकता है। निकटतम पड़ोसियों के साथ का संबंध चरित्र और मानसिकता का परिचायक होता है, जो दूर वालों को भी सच्चे रिश्ते के लिए लुभाता है। कहावत भी है, "दूर का ढोल सुहावन होता है।"
एक छोटा पड़ोसी मुंह बिचका कर बोला:
उसका तो घमंड तो भला, सातवें आसमां में चढ़ा,
पहले तो मिल जाया करता था, अब तो कतरा कर निकल जाता है,
घमंड तो उसका ऐसा है, हमें कुछ नहीं समझता है।।
दूसरा पड़ोसी लपक कर बोला :
हां बड़ी-बड़ी डींगे हंकता है, अपने घर वालों को राशन मात्र खिलता है,
बच्चे उसके बेगारी में पल रहे, धंधा पानी कुछ नहीं कर रहे,
आगे बढ़ने की आस लिए, अच्छे दिन को तरस रहे।।
इतना सुनकर तीसरा तपाक से बोला:
उठना बैठना सब छूट गया, न्योता देना भी भूल गया,
उसके यहां जाने की ख्वाहिश जताई, पर सुन कर वह बस हवा-हवाई,
हमारा बहुत अपमान हुआ है, वह पड़ोसी प्रेम में पूरा नाकाम हुआ है,
बगल के पड़ोसी से निभा ना सका, पांच कोस दूर पड़ोसी ढूंढ़ रहा।।
गोष्ठी में सबसे बड़ा पड़ोसी :
चुपचाप बैठ सब सुनता रहा, बातें सुन वह मुसमुसाता रहा,
कभी इधर देखता कभी उधर देखता, गोष्ठी में अपना अजेनडा सेंकता रहा,
मन ही मन मंत्रमुग्ध होता रहा, पड़ोसियों के बीच दरारों का फायदा आंकता रहा ।।
चौथा पड़ोसी मौका पाते ही बोला:
सोचता क्या है वह अपने आप को, देता है पर बेइज्जत भी करता है,
कुछ देता है तो देने के बाद, अपने बड़प्पन का इज़हार भी करता है,
उसने कहावत ही बदल दिया है, अब दाने-दाने पर उसका (देने वाले का) नाम लिखा है,
दुख से मैं यह बोल रहा हूं, गरीब हूं अपमान मैं सह रहा हूं,
और अपमान सहा न जाएगा, ऐसा पड़ोसी कोई काम ना आएगा।।
उनमें बैठा पांचवा पड़ोसी चिल्लाया:
उसके घर शांति नहीं है, परिवार में अशांति फैला है,
झगड़ा झंझट खूब हुआ है, नफरत का बीज बो चूका है,
अपने घर के लोगों को, मेरे पड़ोसी के घर का बता रहा है,
उनके बीच आग लगा कर, बुरी तरह अराजकता फैला रहा है,
समझ नहीं पा रहा हूं मैं, उसके घर में, पड़ोसी के घर का कैसे पहुंचा।।
उसकी बातों को सुनकर छाटवां रोते-बिलखते बोला:
ईमान से सच बताता हूं, भेद आज मैं उसकी खोलता हूं,
जिनकी तुम बातें कर रहे हो, उन्हें वह मेरे घर का समझता है,
मेरे घर का समझता ही नहीं, मेरे घर में रहने भेजा चुका है,
परेशान हूं मैं, अनावश्यक बोझ से नहीं,
पर अफसोस जो भेजा गया, वह मेरे घर का नहीं,
तुम ही बताओ इस मुसीबत का, मैं निपटारा कैसे करूं भाई।।
सातवां गंभीरता से बोला:
परेशान हूं मैं भी उनसे, सीमा विवादों में पेंच फंसा उनसे,
मसाला सुलझा रहा नहीं है, मेरा हिस्सा नक्शा में अपना बता रहा है,
मेरा अपना छोटा जमीन है, उसे भी वह हथियाने आड़ा हुआ है,
इतना से उसका पेट नहीं भरता है, हमारे आंतरिक मामले में दखल भी देता है।।
चुपचाप सुन रहे एक से रहा नहीं गया:
मेरा तो वह जानी दुश्मन है, कई बार मार धाड उससे हुआ है,
इससे पूरा निपट लेना है, बस हम सब को इकट्ठा होना है,
गोष्ठी में हम सब में सबसे बड़े का, बात सब को समझ लेना है।।
इस पर उनमें से एक पड़ोसी झपटकर बोला:
चले थे हम सब को छोड़, पांच कोस दूर उसे पड़ोस बनाने,
गले मिलकर लगे थे, उसे सहलाने और अपनाने,
झटक दिया हाथ उसने अपना,
औकात दिखा दिया उसे, पांच कोस दूर से अपना।।
इस पर कवि से रहा नहीं गया, वह बोल उठा:
उठो उठो अभी समय है, अपने पड़ोसी के पास जाने का समय है,
पड़ोसी छोटा न बड़ा होता है, पड़ोसी तो बस पड़ोसी होता है,
दुख-सुख में जो काम आता है, वही सच्चा पड़ोसी होता है,
घमंड, पाखंड, दिखावा त्यागो, पड़ोसी को बस अपने समान प्यार करते जाओ।।