हाथों की जूती पैरों में डालो
विचार: यह कविता एक सामाजिक समस्या को उठाती है, उसकी जड़ों पर सवाल करती है, और फिर एक समाधान प्रस्तुत करती है।
यह कविता केवल एक आलोचनात्मक टिप्पणी तक सीमित नहीं है, बल्कि उसे एक सकारात्मक संदेश के साथ समाप्त करता है, जो परिवर्तन और सुधार की उम्मीद जगाता है।
यह उस दर्द की अभिव्यक्ति है, जो नकारत्मक परंपराओं को समाज के द्वारा ढहने के बजाय ढोने के कारण से व्याप्त हैं।
इस कविता की कुछ महत्वपूर्ण बातें :
संदेश: आइए हम सब अपनी जूती अपने हाथ से अपने पैरों को पहनाएं और पैर को दूरगामी मजबूती प्रदान करें - ऐसा ही हो।
जूती की जुबां, एक नया तजुर्बा,
जूता पहनना, भगवान का वरदान,
जूता चलाना, क्या भगवान का ज्ञान?
जूता चलाना, क्या मां ने सिखाया,
जूता चलाना, क्या बाप ने सिखाया,
फिर जूता चलाना, भगवान ने क्यों सिखाया?
एक ने कहा, भगवान के नाम पर दे दो बाबा,
दूसरे ने कहा, खुदा के नाम पर दे दो बाबा,
फिर यह क्या किया, भगवान के नाम पर जूता ही दे दिया!
मां ने मुझे, काम करने भेजा,
बाप ने मुझे, काम करने भेजा,
लेकिन भगवान् ने, जूता फेंकने भेजा!
परंपरा पुरानी है, पहले चलाते थे गोली,
परंपरा की पुनरावृति है, अब चलते हैं जूती,
जूता चलाना निश्चित अब,सामाजिक पतन की निशानी है।
गोली कब कैसे जूती में बदल दी गयी,
यह अब पहले से ज्यादा बेरहम हो गयी,
चलती थी गोली, मरते थे लोग,
अब चलती है जूती, जिंदा लाशन हैं लोग।
क्या अब भी आप, जूता फेंकना चाहते हैं,
या जूता पैरों में पहनकर, आगे बढ़ना चाहते हैं,
आप समाज को, कौन सी दिशा देना चाहते हैं,
क्यों नहीं:
हाथ की जूती पैरों में डालकर,
सामाजिक समरसता के साथ देश का विकास करना चाहते हैं?
उपसंहार
आइए! हम सब अपनी जूती अपने हाथ से अपने पैरों को पहनाएं,
और पैर को दूरगामी मजबूती प्रदान करें,
ऐसा ही हो, ऐसा ही हो, ऐसा ही हो।