Poems

मेरी रचनाओं का संकलन

दिन को चौबीस नहीं, बहत्तर घंटे कर दो

प्रस्तावना : जीवन सिर्फ साँस लेना नहीं,
ये तो एक अनमोल खज़ाना है।
चौबीस घंटों की इस दुनिया में,
बहत्तर घंटे (बेहतर) जीने की तमन्ना है।

यह कविता समर्पित है मेरे माता-पिता, भाई-बहनों, सास-ससुर, ससुराल वालों, पत्नी, बाल-बच्चों के साथ-साथ उन सभी रिश्तेदारों, पड़ोसियों, मेरे शिक्षकों, सहपाठियों, सहकर्मियों, अफ़सरों, समाजसेवियों, कवियों, लेखकों, न्यूज़ रीडरों, एंकरों, नेताओं और जाने-अनजाने तमाम मददगारों को, जिन्होंने हमारे जीवन को बेहतर बनाने में अपना बहुमूल्य समय खर्च किया है। आप सब लोगों का शुक्रिया, धन्यवाद!

इस कविता की कुछ विशेषताएँ:

  • मूल्यों की गहराई: कविता समय की मात्रा (24 घंटे) से परे जाकर उसके गुणवत्ता (Quality) और निस्वार्थ योगदान के मूल्य को दर्शाती है। "बहत्तर" (72) और "बेहतर" (better) का शाब्दिक खेल बहुत ही रचनात्मक और यादगार है।

  • संरचना और प्रवाह: कहानी का प्रवाह सहज है—शुरुआत में सस्पेंस, बच्चों के तर्क, शिक्षक का दार्शनिक उत्तर, और अंत में प्रेरणादायक निष्कर्ष। यह एक संपूर्ण यात्रा है।

  • भाषा: भाषा सरल और प्रभावी है, जो इसे सभी उम्र के पाठकों के लिए उपयुक्त बनाती है।

  • मेरा संदेश: यह एक बहुत ही मार्मिक, शिक्षाप्रद और प्रेरक कविता है। मैंने इसे भावनाओं में बहकर, बड़ी ही भावुकता के साथ लिखा है। मुझे आशा है कि यह रचना आप लोगों के दिलों को छू जाएगी — ऐसा ही हो।



    जॉन अनुरंजन कुजूर
    05/12/2025

    शिक्षक कक्षा ले रहे थे, बच्चों से सवाल पूछ रहे थे,
    तरह-तरह के प्रश्न पूछकर, ज्ञान का दीप जला रहे थे।

    एक सवाल था सीधा-सादा, पर गंभीर था उनका जज्बा,
    "बताओ दिन भर में कितने घंटे?", सोच-समझकर जवाब देना बच्चे।

    बच्चे बोले, चौबीस घंटे, चौबीस घंटे,
    सुनकर शिक्षक मुस्कुराए, अगला सवाल सुनने बच्चे ताके।

    ताकते बच्चों देख शिक्षक सिर हिलाए, आंखों में आंखें डाल वही सवाल दुहराए,
    पुनः सवाल पर बच्चे घबराए, सही जवाब था, फिर भी क्यों दुहराए?

    कक्षा में बिल्कुल सन्नाटा छाया, अजीब सा माहौल बन आया,
    एक बच्चा सहमा सहमा, उठाकर बोला सर सवाल क्यों दुहराए।

    बोलते बोलते बच्चा बोल गया, शिक्षक पर एक सवाल छोड़ गया,
    चौबीस ही तो घंटे होते हैं, आपने सवाल दुहरा कर समय गंवाए।

    बच्चे की मासूमियत पर, शिक्षक भी थोड़ा मुस्कुराए,
    बोले, यदि मैंने तेरा समय गंवाया, तो तुम में से हर एक का, दिन का चौबीस घंटा घटाया।

    फिर शिक्षक हठात ही बोले, मेरे पास एक दिन में चौबीस से ज्यादा घंटे,
    सुन कर बच्चे सन्न रह गए, इशारा किए कि शिक्षक पागल हुए।

    कुछ देर शिक्षक मौन रहे, बच्चों की हलचल निहारते रहे,
    एक बच्चा हिम्मत कर खड़ा हुआ, समझाइए सर, आपका दिन चौबीस से ज्यादा कैसे हुआ।

    सुन कर शिक्षक मुस्कुरा कर बोले,
    मुझ नवजात के चौबीस घंटा को ,
    मेरे माता-पिता ने अपना अपना चौबीस जोड़ बहत्तर (बेहतर) बनाया।
    मेरे बालकपन में माता-पिता,
    भाई-बहन, रिश्तेदार, अड़ोस-पड़ोस,
    सभी ने मेरे चौबीस घंटों को बहत्तर (बेहतर) बनाया।
    शिक्षकों और शिक्षा परिवेश के तमाम लोगों ने,
    मेरे दिन के चौबीस घंटों में अपना समय जोड़ बहत्तर (बेहतर) बनाया।

    फिर थोड़ा सर रुक कर बोले, क्या तुम समझते हो, मैं क्या कर रहा हूं,
    मैं इस वक्त तुम सब के जीवन के चौबीस घंटे में,
    अपना बहुमूल्य समय जोड़कर बहत्तर (बेहतर) बनाने में लगा हूं।

    आओ अपना जीवन सार्थक बनाएं,
    दिन दूना रात चौगुना,
    दूसरों का समय चौबीस से बढ़ाकर बहत्तर (बेहतर) बनाएं।

    एक दिन तुम इंजीनियर डॉक्टर प्रोफेसर अफसर नेता बन जाओगे,
    अपने जीवन के संपर्क में आने वालों का, समय चौबीस से बहत्तर (बेहतर) बनाओगे।
    यही जीवन है, यही जीवन है, दूसरों के लिए जीना ही जीवन है,
    हमने एक दिन में चौबीस नहीं, बहत्तर (बेहतर) जिया है,
    दूसरों को भी एक दिन के चौबीस नहीं, बहत्तर (बेहतर) जीने देना है।

    उपसंहार:
    आईये! हम सब मिलकर उन अनगिनत जाने-अनजाने लोगों को धन्यवाद ज्ञापन कर कृतज्ञता प्रकट करें, जिन्होंने हमारा और आपका जीवन बेहतर बनाया है।

    ==> झारखंड तुझे शांति मिले, भारत तुझे शांति मिले, संपूर्ण विश्व को शांति - यही हमारी कामना है।