परखना ज़रूरी है
प्रस्तावना : यह कविता आज के दौर की एक प्रासंगिक रचना है, जो समाज में व्याप्त समस्याओं को उजागर करती है और उन पर गहराई से विचार करने के लिए प्रेरित करती है।
यह सीधे पाठकों से जुड़कर इन मुद्दों के समाधान पर सोचने का प्रयास करती है, क्योंकि मिलावट की यह समस्या आज हर नागरिक के लिए प्रासंगिक है।
इस कविता की कुछ महत्वपूर्ण बातें :
संदेश: कविता का सबसे महत्वपूर्ण संदेश जीवन में व्यक्तिगत विवेक और जागरूकता का महत्व है। यह स्पष्ट करती है कि समस्याओं का समाधान केवल सरकार या कानून पर निर्भर नहीं करता, बल्कि एक बेहतर, मानसिक और शारीरिक रूप से स्वस्थ समाज के लिए हर नागरिक को अपने विवेक के बल पर सशक्त होना होगा - ऐसा ही हो।
पैसों की भूख ने, इंसानियत निगला,
उसके प्यार में, इंसानियत दफनाया।
सस्ता पाना इंसान की इच्छा,
पर सस्ता के चक्कर में धोखा भी खाया।
हर सस्ता बुरा नहीं होता,
पर सस्ते में बुरा भी हो सकता।
संभल संभल कर खरीदारी करना,
सस्ते के चक्कर में मिलावट से बचाना।
नकली सामान बाजार गरमाया,
मन ही मन इंसान भरमाया,
अच्छा बुरा में भेद ना कर पाया,
अपने हाथों मौत उठा लाया।
नकली दवा, जान पर बन आया,
मिलावटी दारू, बहू बेटियों का घर उजाड़ा।
नकली दूध, बच्चा बीमार कर डाला,
मिलावटी मिठाई, आफत बरपाया।
सस्ता ही सिर्फ नकली नहीं होता,
महंगा में भी नकली पाया जाता है।
जांच परखकर खरीदारी करना,
नकली लाकर आफ़त न मोल लेना।
सोना भी नकली हो सकता है,
चांदी में भी मिलावट हो सकती है।
मेवा छुहारे गरम मसाले,
नकली हुए तो आफत हैं सारे।
पता नहीं चलता सरकार क्या करती,
पुलिस प्रशासन सोई जान पड़ती।
कभी कभार छापा पड़ जाता,
धंधा नकली धड़ल्ले चलता रहता।
मिलावट कहां नहीं है,
मिलावटी का जहां यही है।
एनसीईआरटी का अध्याय बदला,
मूल शिक्षा का स्तर घटाया।
गांधी जी का अध्याय हटाया,
बाबरी मस्जिद का नाम बदल डाला ।
डार्विन का थ्योरी हटाया,
आउटडेटेड कोर्स बहाने वैचारिक मिलावट पर उतर आया।
मिलावट सिर्फ भौतिक ही नहीं,
मिलावट वैचारिक भी होती है।
मिलावट से बच सको तो बच लो,
यह बड़ी घातक सिद्ध होती है।
जैसा मिला वैसे ही मत उठाओ,
थोड़ा अपना दिमाग लगाओ।
जांच-परख कर कदम बढ़ाओ,
सच-झूठ का पता तुम लगाओ।
उपसंहार:
उठो जागो अब तुम ही पहचानो,
असली-नकली का भेद तुम जानो।
जो नकली तुम भाँप पाओगे,
जीवन शानदार जी पाओगे।