संविधान से बेहतर समाज
मैंने वर्तमान परिस्थितियों जैसे सौहार्द की कमी, असहिष्णु, असहनशीलता, कटुता इत्यादि को समझने क्रम मेंमें कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों पर गौर किया है और अपनी कविता में इन पर जोर दिया है। मेरी यह कविता निम्न बिंदुओं के इर्द गिर्द है :
मेरी यह रचना उपरोक्त विंदूओं पर जोर देते हुए हमें अपने विचारों और कार्यों पर पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित करती है।
नियम एक है, विचार अनेक हैं,
नियम ही विचारों की जननी है।
अपने फायदे नुकसान को लेकर,
हम विचारों के भंवर में फंस जाते हैं।
विचारों की लड़ाई जीतने वाले, सदाचार ही अपनाते हैं,
विचारों की लड़ाई हारने वाले, कदाचार में डूब जाते हैं।
नियम सही दिशा दिखाने को रचा है,
हमारे विचार हमें उस दिशा से लगातार भटकते हैं,
शायद अपने स्वार्थ के कारण, हम दुराचार ही करते जाते हैं।
क्या कोई नियम है जो दुराचार को प्रेरित करता है?
नहीं,
हमारे अपने कुविचार और स्वार्थ, हमें दुराचार में टहलाते हैं,
इसलिए तो बाबा साहेब, देश में संविधान लागू करते हैं,
नियम का पालन करने वाले, संविधान को मान्यता देते हैं,
लेकिन स्वार्थ के गढ़ में छिपने वाले, संविधान ताक पर रखते हैं।
हमें व्यक्तिगत हित से उठना होगा,
हमें देश हित में सोचना होगा।
संविधान को ताक में रखने के बजाय,
हमें उसे दिल में बसाना होगा,
स्वार्थी संविधान को ताक पर रखकर,
देश में अराजकता फैलाता है,
पर याद रख तुझे, संविधान ही नियम कानून दिखलाता है।
संविधान का आदर करना है तो,
नियमों का पालन करना होगा,
मौखिक नमन से कुछ नहीं होगा,
उसके अनुसार चलना होगा।
नियमों का पालन करना है तो,
संविधान दिल में छापना होगा,
उपरी मन से कुछ नहीं होगा,
उसे कर्मों में ढालना ही होगा।