इंसानियत मां-सम्मान का पैमाना
विचार:
मेरी यह भावनात्मक कवितामय रचना, मानवता (इंसानियत) के महत्व और माताओं की भूमिका को उजागर करने का एक छोटा प्रयास है, कि मां कैसे अपने बच्चों में इन मूल्यों को संचारित करने का बीड़ा उठाती है।
इस कविता में मैंने माँ की यात्रा की सच्ची झांकी प्रस्तुत करने का प्रयास किया है - कैसे गर्भधारण से लेकर बच्चे की परवरिश और शिक्षा से ले कर अंतिम सांस तक, मां का अंतिम लक्ष्य अपने बच्चे में मानवता को संप्रेषित करना है।
कविता के माध्यम से कुछ महत्वपूर्ण संदेश देने का प्रयास है:
मैं अपने स्व० माता-पिता को इस रचना को समर्पित करते हुए आप सब पाठकों से इस रचना को आपके श्रद्धेय माता-पिता को समर्पित करने का सविनय निवेदन करता हूं - ऐसा ही हो।
मां सिर्फ़ इंसान ही नहीं, इंसानियत की भी जननी है,
जब वह गर्भ धारण करती है,
वह अपने गर्म में प्रस्फुटित इंसान में, इंसानियत कूट-कूट भरने की कसम खाती है,
अपनी कसम पूरा करने की खातिर, वह आने वाले मेहमान की इंसानियत के ख्बाबों में डूब जाती है,
आयरन और कैल्शियम की गोली ही नहीं, इंसानियत की गोली भी उसे खिलाती है,
इस तरह वह अपने गर्म में पल रहे इंसानियत को, बड़े गर्व से बारंबार निहारती है।
जैसे-जैसे सूरज चढ़ता है , जैसे-जैसे दिन निकलता है ,
फूंक-फूंक कर कदम रखती है , इस तरह से बड़े धीरज से, इंसान और इंसानियत को बड़ी सलीके से सहेजती है ,
बड़ी उम्मीद है उसे अपने गर्म से, इसलिए उसके कदर में अपने आप को झकझोरती है,
इस तरह से इंसान की परवरिश अपने कोख में शुरु कर, इंसानियत दुनिया को परोसने की तैयारी में जुट जाती है।
जैसे-जैसे समय आगे बढ़ता है, उनका गर्भ का आकार भी, अनुपाती बढ़ता है,
उनका चलना भले मुश्किल हो जाता है, फिर भी इंसानियत को जन्म देने की खातिर, आहिस्ता आहिस्ता कदम बढ़ाती है,
प्रसव की पहली वेदना पर, अपने पति के कांधे पर हाथ डालकर, इंसानियत को जन्म देने, जब वह अस्पताल जाती है,
अपने पति के आंखों में आंखें मिलाकर, उनके चेहरे पर अपने आंतरिक खुशी की मुस्कान दौड़ती है।
प्रसव पीड़ा से जब वह कहराती है, लेबर रूम में जब उनकी स्थिति डगमगाती है,
चार-आठ घंटे की इस अद्वितीय तड़प में, इंसानियत के जन्म की खातिर, खुद को बार-बार ढांढस बंधाती है,
प्रसव गृह में बिल्कुल अकेली वह, कुछ अनजाने नर्सों के बीच में वह,
प्रसव पीड़ा में कराह कराह कर, अपनों की तलाश में, कभी इधर, कभी उधर देखती है,
तब प्रसव गृह में खुद को अकेला पाकर,
चिल्ला-चिल्ला कर ऊपर वाले को, जल्द से जल्द इंसानियत को जन्म देने की गुहार लगाती है।
अपनी प्रसव वेदना के खत्म होते ही, जब अपने नन्हे जान की पहली आवाज जब सुनती है,
अपने हुए पस्त हालत में ही, अपने नवजात इंसानियत को दूनियां को समर्पित करती है,
जब उनके नवजात का चेहरा, उन्हें पहली बार दिखाया जाता है, अपने हुए पस्त हालात में ही, वह उसमें इंसानियत को निहारती है,
वह अपने दूधमुंहे को, दूध ही नहीं, इंसानियत की घूंट पिलाती है,
पल पल बढ़ता, पलता-बढ़ता, वह अपने नन्हें को, इंसानियत की गुदगुदी से भरती है,
क ख ग घ के साथ वह, उसे इंसानियत की शिक्षा देती है।
जैसे-जैसे नन्हे कदम बढ़ने लगते हैं, उसके इंसानियत के चरितार्थ की खातिर, वह उसे विद्यालय में भर्ती कराती है,
बाल्यावस्था से किशोरावस्था तक, उस पर अपनी पैनी नजर बनाये रखती है,
बच्चे से कुछ गलत होने पर, उसे समझा बूझकर इंसानियत के रास्ते पर लाती है,
कुछ ज्यादा गलत हो जाने पर, उसे डांट फटकार भी लगती है,
मां का ख्वाब यही है भाई-बहनों, वह दुनिया को इंसानियत का उपहार देने को, जी-जान लगा देती है।
युवावस्था में पहुंचे अपने लाल पर वह, डरी सहमी नजर रखती है,
देरी से घर आने पर वह, खोज-बीन उसकी करती है,
उन्हें डर है उनकी बनाई इंसानियत, गलत हाथों में पड़ धूमिल पड़ सकती है,
इसलिए वह अपने युवा बच्चों की ओर, दोस्ताना हाथ बढ़ती है,
मां चाहे, गरीब हो - अमीर हो, मां चाहे किसी भी इंसान की मां हो, इंसानियत पर खतरा भांप लेती है,
इसलिए इंसानियत बचाने की खातिर, अपने जीवन की आखरी सांस भी दांव पर लगाती है।
उठो मां के लालों, अपनी मां को हिसाब दे दो,
अपने अंदर की इंसानियत की झांकी दिखाकर, उनके अरमान पूरे कर दो,
वह चाहे जीवित हैं या स्वार्गिक, तुम इंसानियत की राह पर चलकर, उनके प्रसव पीड़ा का कर्ज अदा कर दो,
इंसानियत की खातिर अपना जीवन कुर्बान कर, उनके दूध का कर्ज़ अदा कर दो,
उनके सिखाए इंसानियत के नक्शे-कदम पर चलकर, उनके अरमान पूरे कर दो।
झूठी इंसानियत से मां को कभी खुश ना कर सकोगे, अपनी चाल-चलन उनसे कभी छिपा ना सकोगे,
अपने कुकर्म से तुम मां को कभी खुश कर ना सकोगे, उनकी परवरिश को तुम कभी धिक्कार ना सकोगे,
कुछ मत करना इंसानियत के विरुद्ध, मां को मजबूर मत करना, उनके अद्वितीय प्रसव पीड़ा के विरुद्ध,
याद रखो, तुम जब भी इंसानियत से भटकते हो, अपनी मां को दरअसल गाली ही देते हो।
उठो उठो अभी समय है, मां की सिखाई इंसानियत की राह पकड़ लो,
अच्छा इंसान बन, अपनी मां का ख्वाब और उनकी कुर्बानी साकार कर दो,
तब समाज में बदलाव आएगा, और तुम एक शानदार किरदार कहलाएगा,
तब मां देख तुमको झुम उठेगी, तुम्हारे जन्म के लिए ईश्वर का धन्यवाद करेगी।
उठो उठो, तुम क्यों सोते हो,
जागो जागो, अपने ख्वाबों का खर्राटा तुम क्यों भरते हो,
अपने घमंड पाखंड दिखावे का जल्द बिस्तर उठाओ, जल्द से जल्द उसे कुंडेदान में डालो,
अपने पाप और कुकर्मों की गठरी बनाकर, बलिदान की वेदी पर चढ़ाओ,
और अपनी मां के इंसानियत की शिक्षा का पोशाक पहनकर, दुनिया को अपनी इंसानियत से खुश कर जाओ,
इस तरह से मां की परवरिश का सम्मान बढ़ाओ, उनकी अदि्वतीय पीड़ा का असर दुनिया को दिखाओ,
दुनिया तुम्हारी ओर देख रही है, टकटकी लगाए तुममे इंसानियत ढूंढ रही है।