जागो समय कम है
विचार:
मैंने यह कविता इसलिए लिखी क्योंकि मैं जीवन के द्वंद्व और सच्चाई की खोज में हमेशा से रुचि रखता हूँ। मैं चाहता था कि लोग अपने भीतर की आवाज़ सुनें और सच्चाई के मार्ग पर चलें।
इस कविता के माध्यम से, मैंने अपने विचारों और भावनाओं को व्यक्त करने का प्रयास किया है, ताकि पाठकों को भी अपने जीवन में सच्चाई और निष्ठा के महत्व का एहसास हो।
कविता के मुख्य बिंदु:
मेरी कामना है कि हम प्रत्येक जन जीवन के हर पल को शत प्रतिशत सच्चाई के साथ जीने के संघर्षों में निरंतर विजयी हों - ऐसा ही हो।
सच्चाई के द्वार पर, बुराई धरना देती है, बुराई के द्वार पर, सच्चाई धरना देती है,
इन दोनों धरनादारों में से तुम किसमें बसना चाहते हो,
यही जीवन भर धर्म युद्ध है,
तुम किसका धरना तोड़ना, और किसका कायम रखना चाहते हो,
तुम्हारे द्वार पे धरना जो देती है, वही तुम्हारा चरित्र व्यां करती है,
यह सिर्फ तुम पर निर्भर करती है,
तुम किसका धरना तोड़ना, और किसका कायम रखना चाहते हो
समझ लो जीवन भर एक ना एक, तेरे द्वार धरना देती ही रहेगी।
सोचने वाली बात है यही, आचरण गिरगिट-सा रंग बदलती है,
जब हमारा अंतरतम मन, सच्चाई की धरना तोड़ती है,
तुरंत हमारी शारीरिक वासना, बुराई की धरना तोड़ती है,
यही सिलसिला चलता रहता है, जीवन गिरगिट सा रंग बदलता रहता है,
यही द्वंद्व है इंसानी जीवन में, मन कुछ चाहती है, लेकिन शरीर कुछ और ही कर बैठती है।
उठो उठो अभी समय है, अंतर्मन की बातें सुन लो,
शरीर की वासनाओं को त्यागो, बुराई की तुम कमर तोड़ दो,
यही द्वंद्व है, यही द्वंद्व है इंसानी जीवन बस एक सांस दूर है,
अच्छाई का तुम धरना तोड़ कर, अंतिम सांस के लिए तैयार हो जाओ,
सदाचरण का संकलन कर कर, अपने चरित्र का सेज सजाओ,
जान लो, जिस दिन तुम उठा लिए जाओगे, तुम निश्चित विजेता कहलाओगे।