Poems

मेरी रचनाओं का संकलन

परम सत्य: प्रेम और सद्भाव

प्रस्तावना: आज के इस दौर में, जहाँ धार्मिक असहिष्णुता की खबरें अक्सर आती हैं, मेरी यह कविता मानवता हेतु सही मार्ग दिखाती है। यह कविता एक 'प्रार्थना' भी है और एक 'आईना' भी।

कविता की मुख्य विशेषताएँ :

  • सर्वशक्तिमान की पहचान : कविता यह बताती है कि ईश्वर हर जगह (कण-कण में) है। वह इतना शक्तिशाली है कि उसे किसी मानव निर्मित सुरक्षा या सीमाओं की आवश्यकता नहीं है। "जब आकाश की तुम थाह नहीं ले सकते!" यह पंक्ति उनकी अनंतता को दर्शाती है।

  • ईश्वर की खोज के मायने : ईश्वर को खोजने का असली मतलब मंदिर, मस्जिद या गिरजाघर जाना ही नहीं है, बल्कि यह कविता सिखाती है कि ईश्वर को अपने मन-मंदिर में बिठाना ही उनकी सच्ची खोज है। बाहरी दिखावे और भौतिक ढांचों के बजाय, आंतरिक शांति, करुणा और प्रेम ही वह वास्तविक मार्ग है जो हमें परमात्मा से जोड़ता है। जब हम अपने भीतर झांकते हैं, तभी हम उस सर्वव्यापी सत्ता का अनुभव कर पाते हैं।

  • सहिष्णुता मानवता का आधार: कविता सहिष्णुता का सबसे बड़ा संदेश देती है। यह बताती है कि "हर मनुष्य की रचना, उनके असीम प्रेम का उपहार है"। इसलिए, धार्मिक असहिष्णुता मानवता के मूल सिद्धांत के खिलाफ है।

  • ईश्वर को खुश कैसे करें: ईश्वर को खुश करने का तरीका नफरत फैलाना या लड़ना नहीं है। उन्हें केवल "नफरत से नफरत है"। ईश्वर को खुश करने के लिए हमें पूर्णतः नफरत-मुक्त होना चाहिए, क्योंकि वे स्वयं हमारे हृदय में वास करना चाहते हैं। ईश्वर और नफरत (दुष्टता) दोनों एक साथ मानव हृदय में वास नहीं कर सकते; ये ठीक वैसे ही हैं जैसे उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव—जो कभी एक साथ नहीं मिल सकते। ईश्वर की प्रसन्नता केवल प्रेम और करुणा के मार्ग पर चलने से ही संभव है।

  • धर्म के लिए अधर्म जायज नहीं: यह कविता का सबसे निर्णायक संदेश है। लड़ना ही है तो अपने अंदर के अधर्म से लड़ो, आपस में भिड़कर, अधर्म से क्या लाभ? नफरत करनना ही है तो अधर्म से करो, एक-दूसरे से नफरत का क्या लाभ? यह स्पष्ट करता है कि धर्म की रक्षा के नाम पर की गई हिंसा, तोड़फोड़ या लड़ाई स्वयं में 'अधर्म' है, और 'अधर्म' ईश्वर को कभी स्वीकार्य नहीं है। असली धार्मिकता दूसरों को नीचा दिखाने में नहीं, बल्कि स्वयं के भीतर के अंधकार को मिटाने में है।

  • दूसरों को नीचा दिखाने के मायने: ईश्वर सर्वव्यापी है, इसीलिए जब कोई किसी व्यक्ति को नीचा दिखाता है, तो वह उस व्यक्ति में विराजमान सर्वशक्तिमान को भी नीचा दिखाता है। जब कोई किसी व्यक्ति से नफरत करता है, तो वह वास्तव में उस व्यक्ति में विराजमान सर्वशक्तिमान से भी नफरत करता है। इसे इस तरह समझें—जैसे कुम्हार के बनाए मिट्टी के बर्तन पर यदि कोई लात मार दे, तो चोट बर्तन को नहीं, बल्कि उसके निर्माता कुम्हार को होती है जिसने उसे गढ़ा है; ठीक उसी प्रकार, किसी भी मनुष्य को ठेस पहुँचाना सीधे उसके निर्माता (सर्वशक्तिमान) को ठेस पहुँचाना है।

  • संदेश: अपने धर्म की रक्षा करने के लिए, अपने अंदर के अधर्म से इतनी नफरत करो कि उसे अपने अंदर चल रहे धर्म और अधर्म के द्वंद्व में बुरी तरह पछाड़ सको। जब तुम अपने भीतर के अंधकार और क्रोध पर विजय पा लेते हो, तभी तुम वास्तव में अपने धर्म के रक्षक बनते हो। ऐसा निस्वार्थ और विशुद्ध प्रयास ही भगवान को प्रसन्न करता है— ऐसा ही हो।



    जॉन अनुरंजन कुजूर
    26/12/2025

    वैसे तो भगवान कण-कण में हैं,
    तुम भले उन्हें अनसुना कर दो,
    वे तुम्हें स्पष्ट सुनते हैं,
    और समझने में चूक नहीं करते।

    तुम उन्हें मंदिर की चौखट से पुकारो या मस्जिद के आंगन से,
    तुम उन्हें गिरजा की शांति में ढूंढो या गुरुद्वारे के कीर्तन में,
    तुम उन्हें अपने एकांत में आवाज़ दो या वीरान रास्तों पर,
    तुम्हारे मुख से शब्द निकलने से पहले ही,
    वे तुम्हारी पुकार सुन लेते हैं।

    तुम्हारे कर्म संपन्न होने से पहले ही,
    तुम्हारी नियत का ब्योरा,
    जीवन-किताब में दर्ज हो जाते हैं।

    वही तो परमेश्वर हैं—शक्तिशाली, ओजस्वी और अनंत,
    तुम दुनिया के डर से मुक्त हो जाओ,
    बस उस चेतना का सम्मान करो,
    जिसे खोजने तुम मंदिर, मस्जिद, या गिरजाघर जाते हो।

    तुम जहाँ चाहो, जब चाहो उनके नाम का सुमिरन करो,
    बस याद रखना, उन्हें केवल नफरत से नफरत है,
    क्योंकि हर मनुष्य की रचना,
    उनके असीम प्रेम का उपहार है।

    लड़ना ही है तो अधर्म से लड़ो,
    आपस में भिड़कर क्यों अधर्म करते हो?
    नफरत करनी है तो अधर्म से करो,
    एक-दूसरे से क्यों करते हो?

    उस रक्षक को सुरक्षा देने की सामर्थ्य किसमें है?
    जब आकाश की तुम थाह नहीं ले सकते!
    तो उस सर्वव्यापी को भला कौन सीमाओं में बांध सकता है?

    वे तो स्वयं तुम्हारे हृदय में वास करना चाहते हैं,
    बिठाना ही है तो उन्हें अपने मन-मंदिर में बिठाओ,
    क्योंकि वे नफरत से परे हैं,
    और उन्हें अपनाकर तुम भी नफरत से मुक्त, प्रेममय हो जाओगे।

    ==> झारखंड तुझे शांति मिले, भारत तुझे शांति मिले, संपूर्ण विश्व को शांति - यही हमारी कामना है।