परम सत्य: प्रेम और सद्भाव
प्रस्तावना:
आज के इस दौर में, जहाँ धार्मिक असहिष्णुता की खबरें अक्सर आती हैं, मेरी यह कविता मानवता हेतु सही मार्ग दिखाती है।
यह कविता एक 'प्रार्थना' भी है और एक 'आईना' भी।
कविता की मुख्य विशेषताएँ :
संदेश: अपने धर्म की रक्षा करने के लिए, अपने अंदर के अधर्म से इतनी नफरत करो कि उसे अपने अंदर चल रहे धर्म और अधर्म के द्वंद्व में बुरी तरह पछाड़ सको। जब तुम अपने भीतर के अंधकार और क्रोध पर विजय पा लेते हो, तभी तुम वास्तव में अपने धर्म के रक्षक बनते हो। ऐसा निस्वार्थ और विशुद्ध प्रयास ही भगवान को प्रसन्न करता है— ऐसा ही हो।
वैसे तो भगवान कण-कण में हैं,
तुम भले उन्हें अनसुना कर दो,
वे तुम्हें स्पष्ट सुनते हैं,
और समझने में चूक नहीं करते।
तुम उन्हें मंदिर की चौखट से पुकारो या मस्जिद के आंगन से,
तुम उन्हें गिरजा की शांति में ढूंढो या गुरुद्वारे के कीर्तन में,
तुम उन्हें अपने एकांत में आवाज़ दो या वीरान रास्तों पर,
तुम्हारे मुख से शब्द निकलने से पहले ही,
वे तुम्हारी पुकार सुन लेते हैं।
तुम्हारे कर्म संपन्न होने से पहले ही,
तुम्हारी नियत का ब्योरा,
जीवन-किताब में दर्ज हो जाते हैं।
वही तो परमेश्वर हैं—शक्तिशाली, ओजस्वी और अनंत,
तुम दुनिया के डर से मुक्त हो जाओ,
बस उस चेतना का सम्मान करो,
जिसे खोजने तुम मंदिर, मस्जिद, या गिरजाघर जाते हो।
तुम जहाँ चाहो, जब चाहो उनके नाम का सुमिरन करो,
बस याद रखना, उन्हें केवल नफरत से नफरत है,
क्योंकि हर मनुष्य की रचना,
उनके असीम प्रेम का उपहार है।
लड़ना ही है तो अधर्म से लड़ो,
आपस में भिड़कर क्यों अधर्म करते हो?
नफरत करनी है तो अधर्म से करो,
एक-दूसरे से क्यों करते हो?
उस रक्षक को सुरक्षा देने की सामर्थ्य किसमें है?
जब आकाश की तुम थाह नहीं ले सकते!
तो उस सर्वव्यापी को भला कौन सीमाओं में बांध सकता है?
वे तो स्वयं तुम्हारे हृदय में वास करना चाहते हैं,
बिठाना ही है तो उन्हें अपने मन-मंदिर में बिठाओ,
क्योंकि वे नफरत से परे हैं,
और उन्हें अपनाकर तुम भी नफरत से मुक्त, प्रेममय हो जाओगे।