आदिवासी और उनका संवैधानिक दायरा
भारतीय संविधान के आलोक में आदिवासी अधिकार: एक काव्यात्मक अपील
यह कविता, जो झारखंड के संदर्भ में पेसा (PESA) कानून और संविधान की पाँचवीं अनुसूची पर केंद्रित है, एक साहित्यिक रचना से कहीं बढ़कर है। यह संवैधानिक अधिकारों, पर्यावरणीय न्याय और आदिवासी समुदाय के सशक्तिकरण के बारे में एक सशक्त और जागरूक करने वाला दस्तावेज है। यह लेख कविता के भीतर निहित संवैधानिक और कानूनी प्रावधानों के महत्व को रेखांकित करता है।
संवैधानिक आधार: पेसा कानून और पाँचवीं अनुसूची:
कविता की नींव पेसा कानून (1996) और संविधान की पाँचवीं अनुसूची में रखी गई है, जो झारखंड जैसे अनुसूचित क्षेत्रों में आदिवासियों के अधिकारों की रक्षा करती है।
कविता में निहित संवैधानिक अनुच्छेद: कविता में जिन संवैधानिक अनुच्छेदों का जिक्र किया गया है, वे आदिवासियों के अधिकारों को और भी मजबूत करते हैं:
कार्यान्वयन में कमी और संवैधानिक जिम्मेदारी कविता इस बात को उजागर करती है कि पेसा और पाँचवीं अनुसूची को अभी तक पूरी तरह से लागू नहीं किया गया है। यह उन लोगों से सीधे तौर पर बात करती है जो मानते हैं कि कानून पूरी तरह से लागू हो गया है और उन लोगों के संघर्ष को स्वीकार करती है जो जानते हैं कि ऐसा नहीं है।
पर्यावरणीय न्याय और जलवायु परिवर्तन: कविता का एक महत्वपूर्ण पहलू पर्यावरण संरक्षण है। यह दर्शाती है कि आदिवासियों ने सदियों से जल, जंगल और जमीन की रक्षा की है, लेकिन 'विकास' ने इस विरासत को बर्बाद कर दिया है।
कविता की अपील और निष्कर्ष: कविता का अंतिम संस्करण एक मजबूत और सकारात्मक संदेश के साथ समाप्त होता है।
संदेश: संक्षेप में, यह कविता आदिवासी अधिकारों, संवैधानिक जागरूकता और पर्यावरण संरक्षण के लिए एक सशक्त माध्यम है। यह केवल एक रचनात्मक अभिव्यक्ति नहीं है, बल्कि एक सामाजिक और राजनीतिक टिप्पणी है जो आदिवासियों को उनके संवैधानिक अधिकारों और विरासत के हक की प्राप्ति लिए प्रेरित करती है।
तुम आदिवासी हो, तुम ही आदिकाल से हो,
तुम कबिले हो, तुम ही जनजातीय पहचान हो,
जल जंगल जमीन, तुम्हारी आन बान शान है,
तुम मानवता की शान, और उसका एहसास हो,
एक नागरिक ही नहीं तुम, जमीन के लजवाब मालिक हो।
तुम इस माटी के सींचक हो, तुम ही माटी के रक्षक हो,
तुम माटी पुत्र ही नहीं, इस, इस माटी के मालिक हो,
अपने पुरखों की शानदार विरासत के, तुम अधिकारिक रक्षक हो,
जल जंगल जमीन की असीम विरासत की, तुम पीढ़ी दर पीढ़ी पहचान हो,
विकास के इस युग में तुम, जल जंगल जमीन के पूर्ण संरक्षक हो।
अपनी परंपराओं और रीति-रिवाजों के, तुम निर्विवाद निर्वाहक हो,
अपनी सामाजिक-धार्मिक प्रथाओं के, तुम निर्विवाद निर्वाहक हो,
अपनी जनजातीय परंपराओं के, तुम निर्विवाद निर्वाहक हो,
संविधान के दायरे में तुम, परंपराओं के भविष्य के संरक्षक हो।
तुम्हारे जनजातियों की ग्राम सभाएं, तुम्हारे हाथों में ताकत है,
तुम्हारे ग्राम सभाओं की व्यवस्थाएं, तुम्हारी परंपरा की जादुई संरक्षक हैं,
जल जंगल जमीन की असीम विरासत, तुम्हारे स्व-शासन से है,
संस्कृति, प्रथा और परंपरा, तुम्हारे स्व-शासन से संरक्षित है,
पेसा कानून और पाँचवीं अनुसूची, तुम्हारे विरासत पर वरदान है।
पेसा कानून और पाँचवीं अनुसूची का, तुम पाठन करो,
ग्राम सभा सोने पे सुहागा है, उसे ठीक से तुम जान लो,
कोई तुम्हारा अधिकार न छीने सके, स्वशासन तुम अपना लो,
संविधान में रहते हुए तुम, अपनी परंपराएं बचा लो,
जिस तरह से तुम, पर्यावरण बचाते आए हो,
अब कानून के दायरे में रहकर, पर्यावरण बचाते रहो।
भोले-भाले प्यारे आदिवासी भाई-बहनों,
उठो जागो ग्राम सभा की व्यवस्थाएं पहचानो,
संविधान की अनुच्छेद १३(२), १९(५) और २४४(२) जानो,
और बेखौफ अपने अधिकारों को पहचानो,
अनुसूचित क्षेत्रों को दुरुपयोग से बचाओ,
अपनी विरासत के खुद संरक्षक बनो,
अपनी शानदार विरासत आगे बढ़ाते जाओ,
जल जंगल जमीन ने तुमको सबकुछ दिया है,
अधिकार के साथ जल जंगल जमीन का कर्ज उतारते जाओ,
इस प्रकार तुम अपनी विरासत की सुंदरता बचाते जाओ।
अंधाधुंध विकास ने पर्यावरण बर्बाद किया है,
जल जंगल जमीन की पवित्र गाथा भी नकार दिया है,
अब नियमत: जल जंगल जमीन बचाने की खातिर,
नियमत: पर्यावरण उत्तम बनाने की खातिर,
जलवायु में हुए परिवर्तन को पूरा नियंत्रित करने की खातिर,
जनजातियों की 'कार्यान्वयन और निरंतरता' की एक छोटी मांग है,
जिसे सरकार, कार्यपालिका और न्यायपालिका निभाने की खातिर,
संवैधानिक प्रावधानों को कागज से निकाले,
और जनजातियों संग मिलकर अमली जामा पहनाएं।
पेसा कानून का मूल विचार यही है,
आदिवासी पारंपरिक स्व-शासन द्वारा,
निर्विवाद और निर्बाध अपनी किस्मत के खुद मालिक बने,
जहाँ प्रकृति की धुनें हमेशा बजती रहें,
तारों के नीचे, विरासत की अंतहीन कहानियां, जनजातियां गढ़ती रहें।