पाप बड़ा या पापी
प्रस्तावना : यह कविता अपनी सादगी में बहुत गहरा अर्थ समेटे हुए है।
मैंने कविता में एक शाश्वत प्रश्न उठाया है और उसका उत्तर बाहरी दुनिया में खोजने के बजाय अपने भीतर ही पाया है, जो भारतीय दर्शन की "आत्म-खोज" की अवधारणा के बहुत करीब है।
इस कविता की कुछ विशेषताएँ:
संदेश: कविता का संदेश बहुत स्पष्ट है: धार्मिक स्थल हमें पाप त्यागना सिखाते हैं, और ईश्वर (सृष्टि का मालिक) हमें पाप-मुक्त, साफ़-सुथरा और हल्का देखना चाहता है। "पाप के कारण अपने बढ़े वजन" का वर्णन पाप के मानसिक बोझ को मापने का एक सशक्त रूपक है।
पाप बड़ा या पापी, सोच में गया कवि,
सवाल से परेशान, अनिद्रा भी हुआ कवि,
तौलने को पाप और पापी, ढूंढने निकला कवि।
ना मिला पाप, ना मिला पापी,
थका हारा, एक मंदिर पहुंचा कवि,
मंदिर के कोने पर लेटे-लेटे, दीवारें पढ़ाने लगा कवि,
झूठ मत बोलो,
चोरी मत करो,
लालच मत करो,
व्यभिचार मत करो,
जब सब पढ़ चुका कवि,
परेशान हो उठा कवि,
बोला-
घर ही में था पाप और और घर पर ही था पापी,
क्यों कैसे कोसों इतना दूर निकला आया कवि।
अपने पाप के वजन का पछतावा ओढ़े, वापस लौटा आया कवि।
कुछ दिनों की मौन में, हल्का हुआ कवि,
फिर मौन खत्म कर बोल उठा कवि:
मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, चर्च, पाप त्यागने की परिधि,
ऐ! पाप का वजनी पापी, तूझे हल्का देखना चाहते स्वामी।