कोहिनूरी अंडा देने वाली सोने की एक मशहूर चिड़िया
यह कविता स्वतंत्रता संग्राम की समावेशी गाथा, उसकी पीड़ा एवं बाधाओं, नागरिकों की भागीदारी और असहयोग, आज़ादी के वास्तविक स्वाद, स्वतंत्रता के बाद औपनिवेशिक शासन के स्पष्ट और निहित प्रभावों के प्रति जागरूकता जगाने और भारत में वर्तमान सामाजिक चुनौतियों का अहिंसक प्रतिरोध के गांधीवादी मार्ग से सामना करने का एक प्रेरणास्रोत है।
सोने की एक मशहूर चिड़िया, कोहिनूरी अंडे वाली चिड़िया,
मिलो दूर जिसकी चमक ने, फिरंगियों की आंखें चौंधियायीं,
कोहिनूर हड़पने की ख्वाहिश में उन्होंने, एक बड़ी साजिश रचायी।
कोहिनूरों के चक्कर में फिरंगियों ने, अजब ऐसा एक जाल बुना,
चिड़िया को ना चाहते हुए भी, बुरा उसमें फंसना पड़ा।
आजादी को फड़फड़ाती चिड़िया को, फिरंगियों ने पिंजरे में नजरबंद किया,
आजादी के अरमां लिए उसने, पिंजड़े में कोहिनूर-ही-कोहिनूर पैदा किया।
कुछ इधर गिरा, कुछ उधर गिरा,
कुछ बेहद चमकीला हुआ, कुछ काला पत्थर-सा निकला।
चमकीले कोहिनूरी सपूतों ने, ऐलान-ए-आजादी संग्राम किया,
लंबे चले उस संग्राम में उन्होंने, अनेकों जान कुर्बान किया,
लेकिन, काले पत्थरों ने, फिरंगियों के हाथ से हाथ मिलाया,
यह देख चिड़िया शर्मींदगी से पानी हुई, वह पिंजड़े में विस्मित हुई।
चिड़िया को तब बड़ा गर्व हुआ, जब उसका कोई कोहिनूर कुर्बान हुआ,
उसका दर्द जारी रहा, जब काला कोहिनूर बेईमान हुआ,
धोखा खा वह सोच में डूबीं, मैला मेरा कोहिनूर कैसे हुआ,
सोच-सोच उसका ऐसा शिकन-ए-हाल हुआ,
मैंने पैदा तो किया कोहिनूर, फिर वह मेरे अरमां के उल्ट, काला पत्थर कैसे बना।
जब-जब काले पत्थरों ने, फिरंगियों का जूता पालिस किया,
तब तब मां की छाती का नस-नस एकदम बेचैन हुआ।
जब-जब कोहिनूरों ने, जलियांवाला बागों में, अपना जीवन कुर्बान किया,
तब-तब मां की दूध का सारा कर्ज अदा हुआ।
नकली कोहिनूरों को माफ कर मां, असली बनाने में जुट गई,
पर,
असली बनाने की उसकी अथक प्रयास, नकलियों को बिल्कुल रास ना आई।
जब काले सारे कोहिनूर, फिरंगियों की झूठी शान में डूबे रहे,
मां चिड़िया के जांबाज कोहिनूर, आजाद संग्राम में फिरंगियों पर टूट पड़े।
जब काले सारे कोहिनूर कायर, फिरंगियों के मुखबिर बने,
मां चिड़िया के जांबाज कोहिनूर, हंसते-हंसते फांसी पर सांस तोड़ते रहे।
जब मां चिड़िया के जांबाज कोहिनूरों ने, जान लूटा कर उसे फिरंगियों से आजाद कराया,
तब बाईं, गांधी, भगत, नेहरु, सुभाष, मौलाना, बाबा, पटेल .... असल वतन-ए-कोहिनूर कहलाया।
आजाद हूई जरुर मां चिड़िया पर,
उसके कोहिनूरों की देश भर में शहादत हुई,
पीछे मुड़कर देख, लाशन बेशुमार गिरी।
इतने लंबे समय के प्रयास के बावजूद, फिरंगियों को सिर्फ एक ही कोहिनूर हाथ लगी,
कीमत आंक कर उन्होंने, अपने वतन के म्यूजियम में सजाई।
फिरंगियों को कहां मालूम उन्होंने, अपने म्यूजियम में क्या सजाया,
बताता हूं, उन्होंने कत्ले-आम मचा, मात्र बेजान पत्थर सजाया,
लेकिन मेरे वतन के वास्ते उन्होंने, अपने म्युजिअम में बेजान परदेशी पत्थर नहीं, भारत मां के कोहिनूरों का एक खुबसूरत स्मारक बनाया।
धन्य हैं वे चमकीले कोहिनूर, सलाम है उन कोहिनूरों का,
जिन्होंने जान दाँव पर लगा, सोने की चिड़िया आज़ाद कराया।
मां की पुकार सुनो ऐ आजाद-हिंद के कोहिनूरों,
विश्राम छोड़ सावधान हो जाओ,
फिरंगियों की बची-खुची सड़ांध आज भी यदा-कदा विभाजनकारी फन उठाती है,
फिरंगियों की बची-खुची सड़ांध आज भी जहां-तहां भ्रांति फैलाती है,
फिरंगियों की बची-खुची सड़ांध आज भी तुझे गुलाम बनाने को फड़फड़ाती है, ।
काले कोहिनूरों की सच्चाई यही है, आज भी अशांति फैलाती है,
पाइंट ब्लैंक डिस्टेंस से,
गांधी, इंदिरा व राजीव जी का बेझिझक सूट आउट करती है।
यदि रखनी है जिंदा, विरासत में मिली शांति-आजादी, तो अहिंसा चौतरफा फैलानी है,
यदि रखनी है जिंदा, विरासत में मिली शांति-आजादी,
तो फिर गांधी की राह पर चल कर, फिरंगियों के म्यूजियम में अवस्थित कोहिनूरी-स्मारक में,
अपना नाम खुदवानी है।