Poems

मेरी रचनाओं का संकलन

नफरत करो, मगर प्यार से

प्रस्तावना: यह कविता नफरत का सूक्ष्म विवेचन है। अक्सर हमें सिखाया जाता है कि नफरत मत करो, लेकिन कोई यह नहीं बताता कि उस नफरत का क्या करें जो हमारे भीतर घर कर चुकी है। यह कविता नफरत को नकारने की नहीं, बल्कि उसे एक 'औजार' (Tool) की तरह इस्तेमाल करने की शिक्षा है। जब हम अपनी ही नफरत के प्रति घृणा पाल लेते हैं, तो वह विष स्वतः ही प्रेम के अमृत में बदल जाता. है। यह रचना नफरत के कड़वे स्वाद से लेकर प्रेम के 'शानदार मेवों' तक की एक वैचारिक यात्रा है।

कविता की मुख्य विशेषताएँ :

  • नफरत का मनोवैज्ञानिक उपयोग: यह कविता क्रांतिकारी विचार देती है कि नफरत को दबाने के बजाय, उसे अपने ही भीतर की बुराई के खिलाफ एक 'हथियार' (Tool) की तरह इस्तेमाल किया जाना चाहिए।

  • नफरत की शिक्षा: यह बिल्कुल तार्किक है कि नफरत सिर्फ बर्बादी नहीं, बल्कि खुद नफरत की दवा भी है। बिना इसकी 'तासीर' और 'ज़हर' को गहराई से समझे, इसे जड़ से खत्म नहीं किया जा सकता। नासमझी, अधूरी समझ के साथ या फिर जानबूझकर की गई नफरत केवल एक 'मार' (भारी बोझ) बनकर रह जाती है, जिससे कभी कोई तृप्ति नहीं मिलती।

  • आत्म-मंथन का सिद्धांत: कविता का मूल मंत्र "नफरत से नफरत करना" है। जब व्यक्ति अपने भीतर की कड़वाहट से घृणा करने लगता है, तो बाहरी नफरत अपने आप खत्म हो जाती है।

  • सामाजिक और व्यक्तिगत पतन: नफरत 'दो कदम आगे' ले जाने का भ्रम नफरती को ज़रूर देती है, लेकिन वास्तविकता में यह समाज को 'दो कदम पीछे' ठेल देती है। इसका एहसास नफरती को बाद में निश्चित होता है, क्योंकि नफरत तब तक सामाजिक ढाँचे को पूरी तरह 'कबाड़' में बदल चुकी होती है, जहाँ से वापसी की राहें धुंधली और सुधार की गुंजाइश ना के बराबर रह जाती है। मगर यह धुंधली उम्मीद ही उस 'सच्ची शिक्षा' का आधार है जो नफरत को प्रेम में बदल सकती है।

  • हृदय परिवर्तन: कविता नफरत को 'थूकने' का एक शक्तिशाली बिम्ब प्रस्तुत करती है। यह पूरी तरह दार्शनिक है कि जैसे ही 'नफरत से नफरत' करने की प्रक्रिया द्वारा आंतरिक शुद्धिकरण शुरू होता है, हृदय की धड़कन की वह मूल ध्वनि—"लब"—अपने आप नफरत के उन्मादी लब को छोड़ कर प्रेम की लब में बदल जाती है। यह रूपांतरण इतना गहरा है कि यह मनुष्य की धड़कन और उसके अस्तित्व के संगीत के सुर-ताल को पूरी तरह बदल देता है।

  • सूक्ष्म विवेचन: कविता का मुख्य आह्वान यह है कि आज के इस दौर में हमें नफरत का ऊपरी नहीं, बल्कि 'सूक्ष्म विवेचन' करने की सख्त आवश्यकता है। यह विश्लेषण इसलिए ज़रूरी है ताकि हम नफरत के विनाशकारी चक्र से उभरने के लिए नफरत को ही नफरत के विरुद्ध हथियार बना सकें। ठीक वैसे ही, जैसे लोहे को लोहा काटता है, अपने भीतर की नफरत के प्रति उपजी नफरत ही हमें प्रेम के वास्तविक स्वरूप तक ले जा सकती है।

  • अंतिम चेतावनी: यदि नफरत करने की इस 'शिक्षा' को ग्रहण नहीं किया गया, तो नफरत अंततः नफरती को ही निगल जाएगी। तब समाज में सेवा और प्रेम जैसे 'शानदार मेवों' की दर-दर तलाश भी बेकार जाएगी।

  • संदेश: देश प्रेमियों, नफरत से नफरत करना सीख लें ताकि समाज में सेवा और प्रेम जैसे 'शानदार मेवे' हर मोड़ पर उपलब्ध हों — ऐसा ही हो।



    जॉन अनुरंजन कुजूर
    20/01/2026

    नफरत करने की भारी छूट है,
    इसलिए छूट कर नफरत करनी है।
    पर कैसी हो यह नफरत बेबाक,
    बताता हूँ, शिक्षा इसकी पहले ले लेनी है।

    नफरत में एक उन्माद है,
    और नफरत का अपना स्वाद भी है।
    गैरों से नफरत— दो कदम आगे भले ले जाए,
    पर समाज में, दो कदम पीछे ज़रूर ठेल देता है।

    नफरत का यदि आनंद लेना है तो,
    और नफरत का स्वाद यदि चखना है तो,
    इसकी तासीर को पहले समझना होगा,
    बिन चुटकी भर चखे इसे, ज्ञान इसका बिल्कुल अधूरा होगा।

    यदि नफरत का असली स्वाद वा आनंद पाना है तो,
    खुद के भीतर की नफरत से नफरत करना ही होगा,
    अपनी नफरत को नफरतए बिना,
    नफरत का मार भारी, स्वाद फीका, और आनंद अधूरा होगा।

    जो अपनी नफरत से नफरत कर पाते,
    वे दिल में भरी दूसरों के प्रति नफरत तुरंत थूक पाते।
    नफरत का कड़वा स्वाद जो उन्होंने एक बार चख लिया है,
    अब नफरत से भरा उनका दिल, खुद-ब-खुद प्रेम में बदल गया है।

    नफरत से पटी यह दुनिया सारी,
    नफरत के दर्शन को अंधी है बेचारी,
    नफरत की जो सच्ची शिक्षा पा लेती प्यारी,
    तो निश्चय खुद की नफरत से नफरत कर लेती दुलारी।

    अब नफरत से उभरने का समय है,
    निगलती हुई नफरती आग को बुझाने का समय है।
    नफरत को अपनी नंगी आँखों से देखने, पहचानने और चखने का समय है,
    यह भीतर तक कबाड़ हो चुके सामाजिक ढाँचे के "सूक्ष्म विवेचन" का समय है।

    नफरत ने तुम्हारा बहुत बिगाड़ा,
    अब नफरत से बदले की बारी है,
    भीतर भरी नफरत से "भारी नफरत" कर,
    प्यार से अंदर की नफरत अपना "कबाड़" लो।

    अब भी नफरत करने की शिक्षा ग्रहण नहीं करोगे क्या?
    नफरत, एक दिन नफरती को भी निगलने दरवाज़े पे खड़ी है।
    तब कुछ भी शेष नहीं यहाँ रह जाएगा,
    सेवा और प्रेम जैसे शानदार मेवों की दर-दर तलाश तब बेकार जाएगा।

    ==> झारखंड तुझे शांति मिले, भारत तुझे शांति मिले, संपूर्ण विश्व को शांति - यही हमारी कामना है।