नफरत करो, मगर प्यार से
प्रस्तावना:
यह कविता नफरत का सूक्ष्म विवेचन है। अक्सर हमें सिखाया जाता है कि नफरत मत करो, लेकिन कोई यह नहीं बताता कि उस नफरत का क्या करें जो हमारे भीतर घर कर चुकी है। यह कविता नफरत को नकारने की नहीं, बल्कि उसे एक 'औजार' (Tool) की तरह इस्तेमाल करने की शिक्षा है। जब हम अपनी ही नफरत के प्रति घृणा पाल लेते हैं, तो वह विष स्वतः ही प्रेम के अमृत में बदल जाता. है। यह रचना नफरत के कड़वे स्वाद से लेकर प्रेम के 'शानदार मेवों' तक की एक वैचारिक यात्रा है।
कविता की मुख्य विशेषताएँ :
संदेश: देश प्रेमियों, नफरत से नफरत करना सीख लें ताकि समाज में सेवा और प्रेम जैसे 'शानदार मेवे' हर मोड़ पर उपलब्ध हों — ऐसा ही हो।
नफरत करने की भारी छूट है,
इसलिए छूट कर नफरत करनी है।
पर कैसी हो यह नफरत बेबाक,
बताता हूँ, शिक्षा इसकी पहले ले लेनी है।
नफरत में एक उन्माद है,
और नफरत का अपना स्वाद भी है।
गैरों से नफरत— दो कदम आगे भले ले जाए,
पर समाज में, दो कदम पीछे ज़रूर ठेल देता है।
नफरत का यदि आनंद लेना है तो,
और नफरत का स्वाद यदि चखना है तो,
इसकी तासीर को पहले समझना होगा,
बिन चुटकी भर चखे इसे, ज्ञान इसका बिल्कुल अधूरा होगा।
यदि नफरत का असली स्वाद वा आनंद पाना है तो,
खुद के भीतर की नफरत से नफरत करना ही होगा,
अपनी नफरत को नफरतए बिना,
नफरत का मार भारी, स्वाद फीका, और आनंद अधूरा होगा।
जो अपनी नफरत से नफरत कर पाते,
वे दिल में भरी दूसरों के प्रति नफरत तुरंत थूक पाते।
नफरत का कड़वा स्वाद जो उन्होंने एक बार चख लिया है,
अब नफरत से भरा उनका दिल, खुद-ब-खुद प्रेम में बदल गया है।
नफरत से पटी यह दुनिया सारी,
नफरत के दर्शन को अंधी है बेचारी,
नफरत की जो सच्ची शिक्षा पा लेती प्यारी,
तो निश्चय खुद की नफरत से नफरत कर लेती दुलारी।
अब नफरत से उभरने का समय है,
निगलती हुई नफरती आग को बुझाने का समय है।
नफरत को अपनी नंगी आँखों से देखने, पहचानने और चखने का समय है,
यह भीतर तक कबाड़ हो चुके सामाजिक ढाँचे के "सूक्ष्म विवेचन" का समय है।
नफरत ने तुम्हारा बहुत बिगाड़ा,
अब नफरत से बदले की बारी है,
भीतर भरी नफरत से "भारी नफरत" कर,
प्यार से अंदर की नफरत अपना "कबाड़" लो।
अब भी नफरत करने की शिक्षा ग्रहण नहीं करोगे क्या?
नफरत, एक दिन नफरती को भी निगलने दरवाज़े पे खड़ी है।
तब कुछ भी शेष नहीं यहाँ रह जाएगा,
सेवा और प्रेम जैसे शानदार मेवों की दर-दर तलाश तब बेकार जाएगा।