सत्य महाशक्ति है।
प्रस्तावना :
जब कभी हम 'शक्ति' को 'सत्य' से ऊपर मान लेते हैं, तब हम मानवीय मूल्यों का पतन निश्चित करते हैं।
असत्य अक्सर बहुत शोर मचाता है और ताकतवर दिखाई देता है, लेकिन उसकी जड़ें सदैव कमजोर होती हैं। यह कविता सत्य और असत्य के उसी सूक्ष्म अंतर को पहचानने का एक आह्वान है।
यह न केवल उन सभी के लिए है जो यह मानते हैं कि सत्य केवल एक शब्द नहीं, बल्कि जीने का एक अटल और अपरिवर्तनीय तरीका है, बल्कि उनके लिए भी है जो सत्य को जान-बूझकर धिक्कारते हैं।
आइए, इस काव्य यात्रा के माध्यम से हम अपने भीतर के उस संयम और धैर्य को पुनर्जीवित करें, जो सत्य का असली आभूषण है और जो जीवन यात्रा को शानदार बनाती है।
कविता के मुख्य बिंदु :
संदेश: सत्य को दबाया जा सकता है, बदला नहीं जा सकता; इसके विपरीत, असत्य का महिमामंडन किया जा सकता है, पर उसे शाश्वत बनाया नहीं जा सकता। अन्ततः: सत्य ही विजयी होता है — ऐसा ही हो।
आओ जाने सत्य पहचाने,
सत्य पहचान, जीवन संवारें।
जीवन सत्य है, मृत्यु सत्य है,
सारी सृष्टि की रचना ही सत्य है।
सत्य से परे कुछ भी नहीं है,
सत्य में जीना ही सत्य है।
चारों ओर नजर दौड़ा कर देखो,
सत्य ही सत्य नजर आयेगा।
फिर भी सत्य के चारों ओर,
असत्य, जाल बुनता दिख जायेगा।
यह भी सत्य है, असत्य अभी जीवित है,
असत्य की पहचान, परम जरूरी है।
सत्य टिकाऊ और शाश्वत है,
असत्य दुर्बल, पर ताकतवर है।
प्रेम दया क्षमा शांति करूणा सहनशीलता,
सत्य के असली लिबास यही हैं।
ईर्ष्या-द्वेश क्रोध वासना व्यभिचार इत्यादि,
असत्य की काली फाँस बनी हैं।
दोनों जीवन जीने का तरीका है,
लेकिन एक पूरब तो दूसरा पश्चिम है।
पूरब पश्चिम कभी नहीं मिलते,
फिर भी असत्य, सत्य से भिड़ते ही रहते।
यह भी सत्य है, यह भी सत्य है,
असत्य में जीना, आसान सत्य है।
सत्य में जीना है तो,
असत्य से द्वंद करना भी सत्य है।
इस तरह से असत्य के नापाक इरादों पर,
पानी फेरना भी सत्य है।
यह भी सत्य है, सत्य अटल है,
सत्य सदा अपरिवर्तनीय तथ्य है।
फिर भी सत्य को बदलने की मंशा,
नापाक इरादों का ही तालमेल है।
असत्य को सत्य मान लेना,
कमजोर इंसान की हकीकत है।
असत्य में जीवन जीना,
सत्य का अपमान भारी है।
सत्य में जीवन जीने वाले,
संयम धैर्यवान सहनशील होते हैं।
असत्य में जीवन जीने वाले,
साम-दाम-दंड-भेद का हथकंडा अपनाते हैं।
सत्य असत्य दोनों ही शक्ति है,
सत्य महाशक्ति, असत्य हीन शक्ति है।
सत्य असत्य दोनों ही गति है,
सत्य अनंत, असत्य क्षणिक है।
चुन लो तुम जीवन जीने वालों,
अनंत या क्षणिक सुख चाहते हो।
सत्य में जीना भी सत्य है,
सत्य में जीने का संकल्प, असत्य से द्वंद्व है।
उपसंहार:
दूनिया की सृष्टि ही सत्य है,
सत्य से सृष्टि अनंत गति है।
सृष्टि को असत्य की हीन-शक्ति से हांकने की मंशा,
बैलगाड़ी के पहियों की तरह टूटना निश्चित है।
निष्कर्ष :