न्यायमूर्ति, पीड़ितों के मुक्तिदाता
विचार:
मेरी यह कविता, न्याय के प्रतीक, न्यायाधीश को एक ऐसी 'मूरत' के रूप में प्रस्तुत करती है जो निष्पक्षता और सच्चाई की सच्ची प्रतिमा है। यह कविता दिखाती है कि कैसे एक न्यायाधीश का पद मात्र एक कर्तव्य नहीं, बल्कि एक पवित्र जिम्मेदारी है,
जिसके माध्यम से वह पीड़ितों के लिए आशा और न्याय का अंतिम स्रोत बनता है। कविता में, न्यायाधीश को परमेश्वर के पूरक के रूप में चित्रित किया गया है, जिन्हें अहंकार, नफरत, और पक्षपात जैसे मानवीय दुर्गुणों से दूर रहते हुए, ईश्वरीय दृष्टि से
न्याय करना है। यह न्यायाधीश को राजनीति और सौदेबाजी से ऊपर उठकर एक ऐसी विरासत छोड़ने के लिए प्रेरित करती है, जो दुनिया के लिए एक आदर्श स्थापित करे। यह कविता न्याय के लिए एक उम्मीद है, यह एक चेतावनी है कि न्याय के
पवित्र आसन पर कोई कलंक न लगे, और यह एक प्रार्थना भी है कि हर न्यायाधीश अपने कर्तव्य का पालन करते हुए प्रेमचंद के 'पंच परमेश्वर' की शानदार भावना को जीवित रखे।
इस कविता की कुछ महत्वपूर्ण बातें :
संदेश: यह कविता सिर्फ न्यायाधीशों के लिए एक मार्गदर्शक नहीं है, बल्कि हर उस व्यक्ति को प्रेरित करेगी जो न्याय और नैतिकता के रास्ते पर चलना चाहता है - ऐसा ही हो।
तुम न्यायमूर्ति हो, मूरत ही बने रहो।
कोई तुझे हिला ना सके, ऐसी अचल मूरत तुम बनो।
तुम बेजान मूरत नहीं, न्याय की तुम जान बनो।
दुष्कर्म मूरत से नहीं, सुकर्म तुम संपन्न करो।
तुम परमेश्वर के मूरत हो, सत्यवान तुम बने रहो।
न्याय के तुम मूरत हो, अन्याय को पछाड़ने तुमआगे बढ़ो।
संसार तुझ में सांसें फूंकेगा, तुम सदा मूरत ही बने रहो।।
तुम मूरत हो, तुम मूरत हो, अहंकार में तुम बसा ना करो।
तुम मूरत हो, तुम मूरत हो, नफरत में तुम पनपा ना करो।
तुम मूरत हो, तुम मूरत हो, जातिवाद में तुम हिला ना करो।
तुम मूरत हो, तुम मूरत हो, भाई-भतीजावाद तुम किया ना करो।
तुम मूरत हो, तुम मूरत हो, पक्षपात में तुम फंसा ना करो।
तुम मूरत हो, तुम मूरत हो, दबाव के आगे तुम झुका ना करो।
तुम मूरत हो, तुम मूरत हो, भावना में तुम कभी बहा ना करो।
तुम मूरत हो, तुम मूरत हो, मूरत के इन गुणों को तुम अपनाया करो।।
तुम मूरत हो, परमेश्वर के पूरक हो, तुम ईश्वर के न्याय के पूरक हो।
तुम मूरत हो, परमेश्वर के पूरक हो, ईश्वर को अपने अंदर से गायब होने मत दो।
तुम मूरत हो, परमेश्वर के पूरक हो, ईश्वरीय नजर से सब कुछ देखो।
तुम मूरत हो, परमेश्वर के पूरक हो, अपने कर्तव्य से सुलह मत कर लो।
तुम मूरत हो, परमेश्वर के पूरक हो, दुनिया को आदर्श प्रदर्शित कर दो।
तुम मूरत हो, परमेश्वर के पूरक हो, एक नायाब विरासत बिछाते जाओ।
तुम मूरत हो, परमेश्वर के पूरक हो, न्यायासन से अन्याय प्रदर्शित मत कर दो।
तुम मूरत हो, परमेश्वर के पूरक हो, सौदेबाज़ी में मत फंस मत जाओ।
तुम मूरत हो, परमेश्वर के पूरक हो, अपने आप को कलंकित मत कर दो।।
तुम मूरत हो, तुम परमेश्वर की खोज हो, न्यायासन कभी हिलने मत दो।
तुम मूरत हो, तुम परमेश्वर की खोज हो, अन्याय कभी होने मत दो।
तुम मूरत हो, तुम परमेश्वर की खोज हो, न्याय की खातिर जीवन कुर्बान कर दो।
तुम मूरत हो, तुम परमेश्वर की खोज हो, न्याय का नायक सदा बने रहो।
तुम मूरत हो, तुम परमेश्वर की खोज हो, न्यायासन को राजनीति से सदा दूर रखो।
तुम मूरत हो, तुम परमेश्वर की खोज हो, माई लार्ड, योर लोर्डशिप सचमुच बने रहो।।
तुम मूरत हो , तुम जरूरत हो, पीड़ित का तुम एकमात्र आस हो।
तुम मूरत हो , तुम जरूरत हो, पीड़ित का तुम एकमात्र आश्रय हो।
तुम मूरत हो, तुम जरूरत हो, पीड़ित का तुम एकमात्र दिलासा हो।
तुम मूरत हो, तुम जरूरत हो, पीड़ित का तुम एकमात्र भरोसा हो।
तुम मूरत हो, तुम जरूरत हो, पीड़ित का तुम एकमात्र परमेश्वर हो।
तुम मूरत हो, तुम जरूरत हो, अशांति में तुम शांति की खोज हो।
तुम मूरत हो, तुम जरूरत हो, अंधकार में तुम ही प्रकाश हो।।
तुम मूरत हो, तुम मूरत हो, तुम परमेश्वर के पवित्र मूरत हो।
तुम मूरत हो , तुम जरूरत हो, सच्चाई की तुम फितरत हो।
तुम मूरत हो, तुम परमेश्वर की खोज हो, निराशा में तुम आशा की आखरी किरण हो।
तुम मूरत हो, परमेश्वर के पूरक हो, तुम दूध का दूध, पानी का पानी हो।
भले मूर्ति पूजा कहीं वर्जित हो, तुम्हारी सच्ची पूजा (मान्यता) कायम रहे।
तुम्हारे मूरत में न्यायी परमेश्वर हो, तुममें वासना की सांसें वर्जित हो।।
तुम मेरे न्यायमूर्ति हो, तुम मुक्तिदाता हो, तुम मुक्ति विधान हो।
अन्याय के खिलाफ मुक्ति संदेश चलने वाला तेरा कलम ही तेरा ईमान हो।
तुम मेरे न्यायमूर्ति हो, सत्य मेव जयते की तुम सिद्धि हो।
प्रेमचंद साहब ने ठीक ही कहा, तुम पंच परमेश्वर हो।।