ना-अधर्म ही धर्म है।
आज की आधुनिकता में धर्म और अधर्म में फर्क मात्र एक महीन फासला है। प्रेम, दया, क्षमा, शांति, करुणा, सहनशीलता, धैर्य की प्राप्ति सौहार्द और भाईचारे की पराकाष्ठा के लिए धर्म जरूरी है। यही कारण है कि धर्म और अधर्म की इस बारीक फासले को मैंने अपने निम्न श्लोक में कलमबद्ध करने का प्रयास किया है।
इस दोहे का मूल संदेश यह है कि हमें अपने जीवन को सच्चाई और ईमानदारी के साथ जीना चाहिए, और धर्म के नाम पर किसी भी तरह का दिखावा या अधर्म नहीं करना चाहिए, जैसा कि बहुधा देखने सुनने को मिलता है।
छीपा कर धर्म करो, ईश्वर निहारते ही रह जाते हैं।
खुले में धर्म करो, भेद खुल ही जाते हैं।
अधर्म के लिए धर्म करो, खोटे सिक्के की तरह पहचान ही लिये जाते हैं।
धर्म की आड़ में अधर्म, पकड़ ही लिए जाते हैं।
धर्म दिखावे की बात नहीं, गुरु समझाते ही रहते हैं।
अधर्म को धर्म कहो, साबित किए ही नहीं जा सकते हैं।
अधर्म करते रहो, धर्म दफा हो जाते हैं।
धर्म करते रहो, अधर्म दफा हो जाते हैं।
अधर्म करो, सौहार्द बेहाल हो जाते हैं।
धर्म करो, सौहार्द बहाल हो जाते हैं।
ना-अधर्म ही धर्म है, समझ लो तो जीवन सफल हो जाते हैं।